मैनपुरी। मैनपुरी के दलदली और कृषि प्रधान क्षेत्रों में पल रहे कछुओं पर चीन और बांग्लादेश की बुरी नजर है। पिछले कुछ वर्षों में मैनपुरी कछुआ तस्करी का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है। दुर्लभ प्रजाति के कछुओं का शिकार करके उन्हें उत्तराखंड के उधम सिंह नगर और पश्चिम बंगाल में सप्लाई किया जा रहा है। यहां से इन कछुओं के अंगों को चीन और बांग्लादेश में निर्यात कर संरक्षित प्रजातियों के अस्तित्व को खतरे में डाला जा रहा है। शिकारी न केवल कछुओं को मारकर उनका मांस सेवन के शौकीन लोगों को बेचते हैं, बल्कि उनके अंगों को तस्करी के बाजार में बेचकर मोटा मुनाफा भी कमाते हैं। कछुओं की केल्पी (ऊपरी झिल्ली) को तस्कर पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर में बेचते हैं, जहां से यह विदेशों में भेजी जाती है। यह कठोर आवरण वाली झिल्ली चीन, बांग्लादेश और अंतरराष्ट्रीय बाजार में शक्तिवर्धक दवाएं बनाने के लिए इस्तेमाल होती है, जो ऊंचे दामों पर बिकती है। तस्करों से बरामद होने वाले कछुओं की कीमत लाखों रुपये में आंकी जाती है। पुलिस के अनुसार, तस्कर एक कछुए को आठ से दस हजार रुपये तक में बेचते हैं। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, मैनपुरी में दलदली इलाके, नहरें, नदियां और तालाब बहुतायत में हैं। यह वातावरण कछुओं के प्राकृतिक आवास के लिए अत्यंत अनुकूल है, जिसके कारण यहां इनकी अच्छी संख्या पाई जाती है।