20एमएनपी-19-घिरोर क्षेत्र में बंद जिला सहकारी समिति
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मैनपुरी। डीएपी की किल्लत से जिले के किसान परेशान हैं। हर तरफ खाद के लिए मारामारी है। वहीं प्रशासन का आंकड़ा जिले में बड़े पैमाने पर डीएपी उपलब्ध होने की गवाही दे रहा है। ऐसे में साफ है कि कीमतें बढ़ाने और अवैध वसूली करने के लिए विक्रेता उर्वरक का स्टॉक गोदामों में कर रहे हैं। इससे किसानों को परेशानी उठानी पड़ रही है। सहकारी समितियों पर भी समय से वितरण न होने के चलते किसान परेशान हैं।
जिले में बड़े पैमाने पर आलू और गेहूं की खेती की जाती है। गेहूं का रकबा जहां डेढ़ लाख हेक्टेयर के करीब है तो वहीं आलू का रकबा 22 हजार हेक्टेयर है। दोनों की बुवाई के लिए डीएपी की आवश्यकता पड़ती है। आलू की बुवाई का काम जहां एक माह पहले ही शुरू हो गया था तो वहीं गेहूं की बुवाई का काम भी बीते एक पखवाड़े से चल रहा है। किसानों को डीएपी की जरूरत है, लेकिन उन्हें डीएपी नहीं मिल पा रही है। अगर डीएपी मिल रही है तो 1350 रुपये की डीएपी की बोरी के लिए उन्हें 1650 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं। प्रशासन का दावा है कि अब तक जिले में 24 हजार मीट्रिक टन डीएपी का वितरण किया जा चुका है। ऐसे में डीएपी की किल्लत नहीं होनी चाहिए। अगर प्रशासन की बात मान ली जाए तो आखिर डीएपी जा कहां रही है।
32400 मीट्रिक टन है वितरण का लक्ष्य
इस साल रबी सीजन के लिए मैनपुरी को शासन से 32400 मीट्रिक टन डीएपी वितरित करने का लक्ष्य दिया गया है। इसमें से अब तक 24 हजार मीट्रिक टन यानी 75 प्रतिशत डीएपी बांटी भी जा चुकी है। अगर ये डीएपी बांटी जा चुकी है तो किसानों के खेतों की बुवाई का काम क्यों प्रभावित हो रहा है।
सहकारी समितियों पर लटक रहे ताले
प्रशासन द्वारा सहकारी समितियों के माध्यम से डीएपी का वितरण कराया जाता है, लेकिन जिले में सहकारी समितियों पर ताले लटके नजर आ रहे हैं। जैसे ही डीएपी आती है तो चहेतों को वितरित कर दी जाती है। वहीं इसके बाद डीएपी के इंतजार में समितियों पर ताले लटके रहते हैं। इससे किसानों को मायूस होना पड़ता है।