लॉकडाउन में गांव महावर निवासी डोरीलाल की निजी कंपनी की सिविल इंजीनियर की नौकरी छूट गई। उन्होंने जल और पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देते हुए मल्चिंग विधि को अपनाते हुए खेती शुरू की। किसान डोरीलाल ने इंटरमीडिएट (कृषि) के बाद सिविल इंजीनियर का डिप्लोमा किया। दो साल पहले नोएडा की निजी कंपनी में उन्हें सिविल इंजीनियर के पद पर नौकरी मिल गई। पिछले साल लॉकडाउन में कंपनी बंद हो गई और वे बेरोजगार हो गए। इसके बाद गांव लौट आए। उन्होंने इंटरमीडिएट में जैविक खेती और सिंचाई के दौरान पानी के संरक्षण की जो विधियां सीखी थीं, उन्हें अपनाया। खेती के लिए मल्चिंग विधि अपनाकर वह मिर्च आदि फसल तैयार कर रहे हैं। इस विधि से खेती में न केवल पानी की बचत होती है बल्कि पौधे की जड़ का विकास होता है। मिट्टी भी सख्त नहीं होती और नमी रहती है। पैदावार भी सामान्य की अपेक्षा अधिक होती है।
क्या है मल्चिंग विधि
मल्चिंग खेतीबाड़ी की आधुनिक विधि है। इससे खेतों में क्यारियां बनाई जाती हैं और उनमें मल्चिंग पॉलिथीन बिछाई जाती है जिससे पानी पॉलिथीन पर चढ़कर बेवजह नहीं बहता। सीधे पौधे की जड़ तक जाता है। इससे लगभग 50 फीसद तक पानी की बचत होती है जबकि सामान्य विधि से सिंचाई करने पर पानी फैलकर बर्बाद हो जाता है।
किसानों की बात-
- मल्चिंग विधि से खेती करने पर पानी का संरक्षण होता है। हमने इसी विधि से खेतीबाड़ी कर रहे हैं। इससे पानी तो संरक्षित होता ही है, फसल भी अच्छी पैदा होती है।- डोरीलाल, किसान।
- मैं भी मल्चिंग विधि से खेती की योजना बना रहा हूं क्योंकि पानी के संरक्षण के लिए मल्चिंग विधि बहुत बेहतर विधि है। इस विधि से खेती करने पर कई लाभ होते हैं। - चंद्रभान, किसान।
- किसान डोरीलाल मल्चिंग विधि से खेती कर रहे हैं। इस विधि से खेती करने पर यह पाया गया है कि पानी का बचाव होता है और पानी बेवजह नहीं बहता। - सुमित चौहान, जिला कृषि अधिकारी।