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ऊपर मकान, नीचे ‘मौत की दुकान’

Thu, 11 Dec 2014 04:52 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला आगरा
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हरा पर्दा टांगा, बोर्ड पर नामी-गिरामी डाक्टरों के नाम और बन गया अस्पताल। यह कहानी यमुनापार स्थित अधिकांश अवैध हास्पिटलाें की है।
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चंद दलालों से सौदेबाजी और चला दी मौत की दुकान। मौत बांटने के यहां पूरे साजो-सामान मिले। कहीं मैनेजर तो कहीं आयुर्वेदाचार्य ही एलोपैथिक के माहिर बने हुए थे।

इंटर पास नर्सिंग स्टाफ और इलाज को एक्सपायरी दवाएं मिलीं। हकीकत देख स्वास्थ्य विभाग की टीम भी भौचक थी। एक अस्पताल सील कर सात को नोटिस थमाया है।

छापेमारी के तीसरे दिन टीम ट्रांस यमुना कालोनी स्थित निर्मल हास्पिटल में पहुंची। पंजीकरण नहीं था जबकि बोर्ड पर दर्जन भर डाक्टरों के नाम लिखे थे। संचालक आयुर्वेदाचार्य अंजनी कुमार गुप्ता एलोपैथिक पद्घति से मरीजों का इलाज कर रहे थे।
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चोरी-छिपे मेडिकल स्टोर चलता मिला, जिसमें दवाओं का जखीरा मिला। दोनों पर सीलिंग की कार्रवाई हुई। श्री गोपाल हास्पिटल में भी यही हाल मिला। आयुर्वेदाचार्य दीपक वार्ष्णेय एलोपैथिक चिकित्सक की भूमिका में थे। छह मरीज भर्ती थे, इनके इलाज को कोई डाक्टर नहीं था।

अंट्रेंड स्टाफ औपचारिकता निभा रहा था। ओटी में उपकरण जंग लगे हुए थे, लेबर और इमरजेंसी रूम भी नहीं था। छापेमार टीम में एसीएमओ डा. वीरेंद्र भारती, एसीएमओ डा. आनंद वर्मा, एसीएमओ डा. एसके सिंह, एसीएमओ डा. अजय कपूर, कमल गुप्ता, जितेंद्र जैन रहे।

- हास्पिटल में इमरजेंसी चिकित्सक और प्रशिक्षित स्टाफ नहीं मिला। मानक किसी में पूरे नहीं मिले। नोटिस का जवाब न मिलने पर इनको सील किया जाएगा, रिपोर्ट बनाकर डीएम और एसएसपी को भी सौंपी जाएगी।
डा. एचएस दानू, सीएमओ

- चिकित्सकीय व्यवस्थाएं चौपट मिली। इनके खिलाफ रिपोर्ट तैयार की जा रही है। कानूनी कार्रवाई भी होगी।   
ए. दिनेश कुमार, एसीएम प्रथम

किचिन में भी बेड
अधिकांश अस्पताल घराें में चल रहे हैं, ऊपर मकान मालिक और नीचे ‘मौत की दुकान’ है। वैष्णवी हास्पिटल में तो किचिन में ही बेड लगा रहा था। तीन मरीज थे और अंट्रेंड स्टाफ मिला। संचालक डा. अशोक गुप्ता ने पंजीकरण के लिए आवेदन की बात कही। ऐसा ही हाल जयदेवी हास्पिटल का था। यहां मालिक डा. शैलेंद्र सिंह ही हास्पिटल चला रहे थे, जबकि पंजीकृत चिकित्सक नहीं मिले। वार्ड में गंदगी और ओटी में इमरजेंसी चिकित्सक नहीं। दूसरी मंजिल पर बने ओटी के लिए लिफ्ट या स्लैप नहीं।

दो लोग ही चला रहे अस्पताल
श्री राधे हास्पिटल और सलोनी हास्पिटल में दो-दो लोग ही अस्पताल को चला रहे थे। पैरा मेडिकल स्टाफ और एक भी डाक्टर नहीं मिला। कोठरी में ओटी चल रहा था, जिसमें उपकरण भी गंदे थे। मेडिकल वेस्ट भी बिखरा हुआ। श्री राधे हास्पिटल में पंजीकरण के तौर पर डा. एचबी शर्मा नहीं मिले। वहीं सलोनी नर्सिंग होम में सत्यप्रकाश नामक मैनेजर रहा।

7 बेड का पंजीकरण मिले 11
अंबे हास्पिटल में सात बेड स्वीकृत थे। मौके पर 11 मिले। पैरामेडिकल स्टाफ और डाक्टर नहीं, मेडिकल वेस्ट को एक कोने में ढेर लगा था। यहां मरीजों की फाइल नहीं और नहीं किसी चिकित्सक के हस्ताक्षर।

नर्मदा हास्पिटल में एक्सपायर दवाएं
- नर्मदा हास्पिटल में टीम को ओटी में एक्सपायर दवाएं मिलीं। यहां इंटर पास नर्सिंग स्टाफ था। वार्ड छोटे थे और गंदगी पसरी हुई थी। इस पर यहां के स्टाफ ने टीम को विरोध कर दबाव बनाया। एसीएमओ डा. वीरेंद्र भारती ने बताया कि कार्य में बाधा पहुंचाई इसकी शिकायत सीएमओ से की जाएगी।

वेतन नहीं कमीशन तय
हास्पिटल में किसी भी स्टाफ को वेतन नहीं दिया जाता। स्टाफ को मरीज लाने पर ही कमीशन दिया जाता है। टीम की पूछताछ में पता चला कि इस खेल में एंबुलेंस संचालक और झोलाछाप भी शामिल हैं।
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कलंक से दुखी डाक्टर
यमुनापार अवैध हास्पिटल की मंडी के नाम पर कुख्यात हो चुका है। लंबे समय से यहां के क्वालीफाई चिकित्सक इस कलंक का दंश झेल रहे हैं। कुछेक चिकित्सकों ने तो यहां से अन्यत्र जाने का मन बना लिया है। ट्रांस यमुना कालोनी डाक्टर एसोसिएशन सचिव डा. मनोज जैन का कहना है कि चंद लोगों की वजह से यह हालात पैदा हुए हैं। डा. डीपी शर्मा का कहना है कि आईएमए के सदस्य ऐसे किसी भी अस्पताल में इलाज को न जाएं, जो अवैध हैं। प्रशासन को भी ऐसे झोलाछाप पर कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। डा. आलोक मित्तल का कहना है कि हास्पिटल खुलते ही स्वास्थ्य विभाग को सक्रिय हो जाना चाहिए।
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