पहले व्यापारी नेता हेमनदास जैसवानी की हत्या। फिर उनके बेटे सुशील का सरेआम मर्डर। दोनों बार पुलिस की लापरवाही सामने आई। दोनों ही वारदात के बाद कार्रवाई में ढिलाई हुई। पुलिस के इस रवैय्ये से पीड़ित परिवार बुरी तरह आहत है। इन लोगों का कहना है कि पुलिस ने न तो पहले उनकी सुनी और न ही अब उनकी सुरक्षा का इंतजाम किया जा रहा है।
दिवंगत सुशील के भाई हरीश जैसवानी कहते हैं कि अगर पुलिस ने बदमाशों का नेटवर्क तोड़ दिया होता तो उनके भाई की यूं सरेआम हत्या न होती। किसको नहीं मालूम है कि प्रांजल जेल मेें बैठा गैंग चला रहा है, लेकिन पुलिस ने उसका नेटवर्क नहीं तोड़ा। अगर उसे कहीं और ट्रांसफर कर दिया होता तो उसकी कमर टूट जाती। उसके गैंग के सदस्यों को एक जेल में रखने के बजाय आगरा से दूर अलग-अलग जेलों में रखना चाहिए।
हरीश बताते हैं कि पुलिस ने उन्हें गनर मुहैय्या करा दिया है, लेकिन न घर पर सुरक्षा लगी है और न ही दुकान पर। उनके अलावा उनके पिता की हत्या के केस में और भी गवाह हैं। उनकी गवाही भी जल्द ही होनी है। उन्हें सुरक्षा नहीं मिली है। सबसे बड़ा डर इस बात का है कि हत्यारोपी अभी भी खुले घूम रहे हैं।
: मैं उस दिन भी लाइसेंस मांगने गई थी
दिवगंत सुशील की बहन सुनीता जैसवानी की आंखेें आंसुओं से नम हैं, और मन में गुस्सा भरा है पुलिस की लापरवाही पर। कुछ बोलती हैं, तो आक्रोश की ज्वाला जुबां पर आ जाती है। कहती हैं, हमने 10-20 लाइसेंस नहीं मांगे थे, सिर्फ एक के लिए आवेदन किया था, मेरे भाई सुशील की गवाही होनी थी, उसकी जान खतरे में थी। मैं उस दिन (12 अगस्त को) भी डीएम के दफ्तर गई थी असलाह बाबू से पूछने, लाइसेंस कब तक बन जाएगा? उसी दिन मेरे भाई की हत्या हो गई।
...सुनो एसएसपी साहब
--। घर और दुकान पर सुरक्षाकर्मी तैनात किए जाएं।
--। जब तक केस चले, तब तक गनर न हटाए जाएं।
--। प्रांजल गैंग के सदस्यों की हिस्ट्रीशीट खोली जाए।
--। चौथ वसूली करने वाला यह गैंग रजिस्टर किया जाए।
--। गैंग के सदस्यों को अलग-अलग जेल में रखा जाए।
--। हेमनदास हत्याकांड फास्ट ट्रैक कोर्ट में ट्रांसफर हो।