न पढ़ाई की, न कालेज गए, न परीक्षा दी, फिर भी अव्वल नंबर और सरकारी नौकरी। यही तो हुआ था मध्य प्रदेश के व्यापम (व्यावसायिक परिक्षा मंडल) घोटाले में। जैसे वहां अफसरों ने जालसाजी से अपने रिश्तेदारों को नौकरियां दिलाईं। ठीक वैसा ही खेल डा. बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय में भी हुआ है। इसका खुलासा एसआईटी की जांच में हुआ है। हजारों जाली मार्क्सशीट विवि के अफसरों और बाबुओं के 100 से ज्यादा रिश्तेदारों की हैं। इनमें से 50 फीसदी को नौकरी भी मिल चुकी है। सबसे ज्यादा सहायक अध्यापक नियुक्त हुए हैं।
इस घोटाले का हर खुलासा विवि में खलबली मचा रहा है। कई अफसर और बाबू पहले तो इसीलिए सहमे थे कि उनकी जालसाजी का खेल खुल गया है। लेकिन अब और काले कारनामे सामने आए हैं तो हालत और खराब हो गई है। विवि में इन दिनों जबरदस्त हड़कंप मचा है। घोटाले की जांच कर रही एसआईटी 11 अगस्त को हाईकोर्ट में जांच रिपोर्ट रखेगी।
केस से जुड़े सूत्रों का कहना है कि 2007 से 2010 के बीच जब जाली मार्क्सशीट बनाई जा रही थी, तो कई अफसरों और बाबुओं के रिश्तेदारों ने भी मौके का फायदा उठाया। सबसे अहम बात यह थी कि बीए, एमए और बीएड की जाली मार्क्सशीट पाने वालों के नाम गोपनीय चार्ट में दर्ज किए जा रहे थे।
सरकारी महकमे में जब किसी अभ्यर्थी के शैक्षिक दस्तावेज का सत्यापन कराते हैं, तो गोपनीय चार्ट ही देखा जाता है। इसलिए पकड़े जाने की संभावना बहुत कम थी। लेकिन इनका रिकार्ड न तो कॉलेज में था और न ही विवि में। एसआईटी में शामिल रहे एक उच्च पदस्थ अधिकारी ने बताया कि इस घोटाले में अभी और भी कई लोग नप सकते हैं।
उधर, कुलसचिव केएन सिंह ने बताया कि जाली मार्क्सशीट घोटाले में विवि ने अपनी ओर से एफआईआर कराई, कुछ लोग गिरफ्तार भी हुए हैं, लेकिन यह जानकारी नहीं है कि अधिकारियों और बाबुओं ने अपने रिश्तेदारों की भी जाली मार्क्सशीट बनवाई। हो सकता है एसआईटी जांच में ऐसे तथ्य सामने आए हों।