दिव्य के अपहरण का पता चलते ही उसकी मां मोना उर्फ नेहा अपनी कार लेकर निकल पड़ीं। उन्हें पता चला कि बदमाश सिकंदरा की ओर गए हैं। वे कार लेकर उधर ही चल दीं। करीब डेढ़ घंटे तक दिव्य की तलाश में कार दौड़ाती रहीं, लेकिन उसका कुछ पता नहीं चल पाया। इसके बाद लौट आई। उनका जज्बा देखकर ऐसे लग रहा था कि अगर बदमाश दिख जाते तो उनसे अकेले ही भिड़ जातीं। जिगर के टुकड़े को खतरे में देख उन्होंने अंजाम की परवाह नहीं की। बदमाश कितने हैं, उनके पास क्या हथियार हैं, कुछ सोचा ही नहीं। कोठी से निकलते ही सिर्फ इतना पूछा कि बदमाश किधर की ओर भागे हैं। सिकंदरा की ओर गए हैं। उधर ही कार दौड़ा दी। उधर कोठी पर पुलिस पहुंची तो काफी देर तक घटना की जानकारी करती रही। लेकिन मोना ने एक पल भी नहीं गंवाया। उधर, परिवार के लोग यह पता चलने पर परेशान हो गए कि मोना बदमाशों के पीछे गई हैं। उन्हें चिंता हो गई कि अगर बदमाशों से आमना सामना हो गया तो क्या होगा?
‘मेरे सामने उठाकर ले गए मेरा लाल’
दिव्य की दादी शशि वार्ष्णेय घटना की चश्मदीद हैं। उन्होंने ही पुलिस को पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी। उन्होंने कहा, दिव्य रोज साइकिल चलाता है। यही समय रहता है। उसकी मां अंदर थी। मैं बाहर दिव्य को देख रही थी। तभी पहले एक बदमाश गेट खोलकर अंदर आया। उसने दिव्य को उठाया। दूसरा गेट के बाहर बाइक स्टार्ट किए खड़ा था। पहले वाला बच्चे को लेकर बाइक पर बैठ गया। फिर दोनोें भाग गए।
मम्मी! भैया कहां चला गया
दिव्य का छोटा भाई काव्यांश तीन साल का है। दिव्य साइकिल चलाने के बाद उसके साथ खेलता है। वह नहीं आया, तो काव्यांश उसके बारे में पूछने लगा। जब घर में काफी भीड़ आ गई। पुलिस पहुंच गई तो वह घबरा गया। रोने लगा। उसने कई बार अपनी मम्मी से पूछा, भैया कहां गया है?