हरीपर्वत थाना पुलिस ने सात मई की सुबह जिस शख्स की लाश लावारिस बताकर आनन-फानन में फूंक दी थी, वह तोता के ताल के रहने वाले 80 वर्षीय दिव्यांग खूबीराम थे। इसकी जानकारी होने के बावजूद पुलिस ने शव उनके परिवारीजनों को सौंपने के बजाय नियम-कानून ताक पर रखकर खुद दाह संस्कार किया। वह भी अज्ञात में। पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम तो कराया ही नहीं, अब जानकारी आई है कि पंचनामा भी नहीं भरा। जाहिर है, अगर पूरे प्रकरण की गंभीरता से जांच हो गई तो दोषी पुलिसवालों पर कड़ी कार्रवाई होना तय है।
हरीपर्वत थाना के दरोगा कर्ण सिंह और अन्य पुलिसकर्मियों ने क्षेत्र बजाजा कमेटी के ऑफिस में छह मई की रात 12 बजे पहले यही लिखकर दिया था कि मानसिक आरोग्यशाला के पास शव मिला है। उसकी शिनाख्त खूबीराम पुत्र चरनलाल के रूप में हुई है। उम्र 80 साल है। उसके भाई गेंदा लाल तोता का ताल पर रहते हैं।
क्षेत्र बजाजा कमेटी दाह संस्कार सामग्री और शव ले लाने के लिए वाहन मुहैया कराती है। कमेटी के मैनेजर ने पुलिस को यह कहकर शव वाहन देने से इनकार कर दिया था कि एक तो रात में अंतिम संस्कार नहीं होते हैं। दूसरा, पुलिस का मामला है, फिर भी पोस्टमार्टम नहीं कराया गया है।
इस पर पुलिस शव को पोस्टमार्टम हाउस ले गई लेकिन रिकार्ड में दर्ज नहीं कराया। न ही शव का पंचनामा भरा गया था। सात की सुबह शव को अज्ञात बताकर श्मशान घाट पर फूंक दिया गया। अमर उजाला टीम रविवार को खूबीराम के भाई गेंदालाल से मिली। उनका कहना है कि उन्होंने पुलिस को ऐसा कुछ लिखकर नहीं दिया था कि वह पोस्टमार्टम नहीं चाहते हैं।
गेंदालाल से पता चला कि खूबीराम 25 साल से परिवार से अलग रहते थे। ट्रांसपोर्ट नगर में एक ढाबे पर काम करते थे। काफी समय से मानसिक आरोग्यशाला के पास स्थित सुलभ शौचालय के बराबर में रहते थे। वहीं पर उनकी मृत्यु हुई। पुलिस ने उन्हें सूचना दी लेकिन शव नहीं सौंपा।
...तो इसलिए नहीं की पुलिस ने लिखा-पढ़ी
आगरा। सात मई को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आगरा आए थे। उनका हरीपर्वत थाने के निरीक्षण का कार्यक्रम प्रस्तावित था। हालांकि वह यहां आए नहीं लेकिन माना जा रहा है कि निरीक्षण के डर से पुलिस ने कानून ताक पर रखकर मनमानी की। पुलिस सूत्रों का कहना है कि डर यह था कि अगर शव का पोस्टमार्टम कराया और मामला हत्या का निकला तो मुश्किल आ जाएगी। ताजा मामला होगा, कहीं सीएम इसी पर सवाल न कर बैठें। दूसरा, थाने की व्यवस्थाएं चकाचक करनी थी, पूरा स्टाफ इसी में लगा था। अगर शव का पोस्टमार्टम कराया जाता तो एक दरोगा और कम से कम दो सिपाही इसी में व्यस्त रहेंगे। इसकेचलते मनमानी पर उतर आई। खूबीराम के परिवारीजनों ने ऐसा कुछ लिखकर भी नहीं दिया था कि वे पोस्टमार्टम नहीं चाहते।