शमसाबाद और खंदौली में जहरीली शराब से 13 लोगों की मौत होने के सनसनीखेज मामले के रहस्य से पर्दा उठ गया है। लगभग 20 दिन चले विसरा परीक्षण से साफ हुआ है कि शराब को जहर मिथाइल एल्कोहल (मेथेनॉल) ने ही बनाया। फोरेंसिक साइंस लैब ने सोमवार को इसकी रिपोर्ट पुलिस को भेज दी है। इसकी मदद से शराब माफियाओं को सजा दिलाने में बड़ी मदद मिलेगी। इन पर गैंगस्टर एक्ट भी आसानी से लगाया जा सकेगा।
हालांकि अभी शमसाबाद में हुई तीन लोगों की मौत के बारे में ही रिपोर्ट आई है, लेकिन सभी लोग एक ही तरीके से मरे थे। इसलिए सभी की मौत वजह एक ही मानी जा रही है। शमसाबाद के तीन लोगों की मौत के मामले में पोस्टमार्टम के बाद विसरा संरक्षित कर परीक्षण के लिए एफएसएल भेजा गया था।
डीआईजी लक्ष्मी सिंह की संस्तुति के चलते इसका परीक्षण प्राथमिकता के आधार पर किया गया, वरना विसरा जांच में छह महीने से लेकर एक साल तक लग जाते हैं। पुलिस सूत्रों के मुताबिक एफएसएल से मिली रिपोर्ट में तीनों की मौत की वजह मेथेनॉल बताई गई है। यह बेहद खतरनाक होता है, इसे ज्यादा मिलाने से शराब जहरीली हो जाती है। शराब बनाने की सही विधि में इथाइल एल्कोहल ( एथेनॉल ) का इस्तेमाल होता है। रंग, गंध और स्वाद के आधार पर एथेनॅाल और मेथेनॉल में फर्क करना बहुत ही मुश्किल है।
क्यों मिलाते हैं शराब में जहर
आबकारी विभाग के अधिकारी बताते हैं कि एथेनॉल से बनी शराब में बहुत थोड़ा सा मेथेनॉल नशा बढ़ाने के लिए मिलाया जाता है। जब इसकी मात्रा बढ़ जाती है तो शराब जहरीली हो जाती है। अवैध शराब बनाने वाले कई लोग नशा बढ़ाने के लिए यूरिया का भी इस्तेमाल करते हैं।
सबसे पहले जाती है रोशनी
अगर शराब में मेथेनॉल की मात्रा अधिक है तो यह शरीर में जाने के बाद सबसे पहले धमनी तंत्र पर असर करती है। आंखों की धमनियां (ऑप्टिकल नर्व) सबसे कोमल होती है, इसलिए सबसे पहले इन्हीं पर प्रभाव पड़ता है और पीने वाले को दिखाई देना बंद हो जाता है।
कच्ची से ज्यादा पक्की खतरनाक
अवैध शराब में जो लहन से भट्टी पर बनाई जाती है, वह भी सेहत के लिए बड़ी खतरनाक है। लेकिन इसकी तुलना में सीधे एल्कोहल से बनने वाली शराब ज्यादा नुकसान देती है। इसे बनाने वाले बहुत छोटी सी प्रक्रिया अपनाते हैं। एल्कोहल के ड्रम में रंग घोलकर बोतल या पन्नी में पैक कर दिया जाता है।