आगरा। सपा राज में हुई भर्तियों की सीबीआई जांच होने से यूपीएससी के पूर्व चेयरमैन अनिल यादव की मुश्किलें बढ़ने जा रही हैं। उन्हें एक साथ दो मुश्किलों का सामना करना होगा। एक तो भर्तियों को लेकर है। तमाम विवाद उनके कार्यकाल में हुई भर्तियों को लेकर हुए थे। अनिल यादव कमला नगर के रहने वाले हैं।
उनकी दूसरी मुश्किल है उन मुकदमों की जिनका ब्योरा ही पुलिस ने गायब कर दिया। उनके खिलाफ संगीन धाराओं में केस दर्ज हैं, लेकिन सपा राज में पुलिस ने उनकी हिस्ट्रीशीट ही खत्म कर दी थी। अब सीबीआई जांच होगी, तो पुराने चिट्ठे खुलने तय हैं। उनकी हिस्ट्रीशीट न्यू आगरा थाना में थी।
एसएसपी ऑफिस के रिकार्ड में लिखा है, उनकी हिस्ट्रीशीट को खत्म किया गया। यह किसके आदेश से की गई? इसके लिए किस प्रक्रिया को अपनाया गया? इसकी वजह क्या रही? इसका स्पष्ट उल्लेख कहीं पर नहीं है। सीबीआई को इसी मामले की जांच से अंदाजा हो जाएगा कि सरकार उन पर कितनी मेहरबान रही और वह मनमानी कैसे कर पाए। उस समय अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद समेत कई संगठनों ने उनके खिलाफ हंगामा प्रदर्शन किया था लेकिन तब पुलिस उनके रुतबे के आगे झुकी रहती थी।
हालांकि हिस्ट्रीशीट के बारे में सवाल उठने पर उनकी ओर से कई बार सफाई दी गई कि यह प्रक्रिया के तहत ही नष्ट की गई है लेकिन पुलिस अफसर चुप्पी साधे रहे। भाजपा ने भी यह मुद्दा जोर शोर से उछाला था कि जिस व्यक्ति पर इतने संगीन केस दर्ज हैं, उसे यूपी लोकसेवा आयोग का चेयरमैन बनाया गया है। तब सपा की सरकार थी, भाजपाई उनका बाल बांका नहीं कर पाए। अब कहानी और है। सत्ता भाजपा के पास है और मामले की सीबीआई जांच कराने का एलान किया जा चुका है।