जीवनदायनी नदियां अब जीवन के लिए खतरा भी साबित हो सकती हैं। कई नदियों का पानी तो ‘जहर’ से कम नहीं है। करबन नदी इनमें से एक है। दो साल पहले इसका पानी पीने से दर्जनों नील गाय मर चुकी हैं। अब भी इसकी हालत में ज्यादा सुधार नहीं है। नदी के पानी की स्थिति लगभग वही है। ये सब दो साल पहले तैयार की गई जांच रिपोर्ट पर अमल न करने के कारण है। गनीमत है तो सिर्फ इतनी कि हाल-फिलहाल किसी जानवर को इसका पानी पीने से जान से हाथ नहीं धोना पड़ा है।
बता दें कि गौतमबुद्धनगर की दादरी तहसील के गांव जारचा से प्रारंभ होने वाली करबन नदी का पानी पीने से मार्च 2014 में दर्जनों नील गाय मर गई थीं। दुर्गंध की वजह से क्षेत्र में संक्रमण का खतरा फैल गया था। इसको देखते हुए 15 मार्च 2014 को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की आगरा और अलीगढ़ की टीम ने संयुक्त रूप से नदी के पानी का परीक्षण किया, जिसकी जांच में पता चला कि नदी का पानी इतना दूषित हो चुका है कि इसमें ऑक्सीजन लगभग खत्म ही हो गई है। कमोबेश अभी भी हालत लगभग ऐसी ही है। पानी में केमिकल मिले होने के कारण नदी के पुल पर बर्फ जैसे झाग के ऊंचे-ऊंचे पहाड़ खड़े हो गए हैं। टीम ने जो संस्तुतियां की थीं, उन पर अमल न हो पाने की वजह से नदी का पानी जलीय जीव-जंतुओं के लिए हानिकारक बना हुआ है।
कालिंदी को भी पहुंचा रही नुकसान
करबन इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि इसका असर यमुना पर भी पड़ रहा है। हालांकि यमुना का पानी भी कम दूषित नहीं है लेकिन करबन का पानी मिलने के बाद ये और दूषित हो जाता है। बता दें कि करबन नदी ताजमहल के डाउन स्ट्रीम में यमुना में मिलती है।
टीम ने ये की थी संस्तुतियां
. जल निगम द्वारा करबन नदी में घरेलू जलमल निस्तारण करने वाले विभिन्न स्थानीय निकाय (नगर पालिका परिषद सिकंदराबाद, खुर्जा, इगलास, हाथरस तथा नगर निगम अलीगढ़, नगर पंचायत मुरसान एवं सादाबाद) पर्याप्त क्षमता के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों की स्थापना एवं समुचित रखरखाव एव संचालन की व्यवस्था करें।
. उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जनपद बुलंदशहर के सिकंदराबाद एवं खुर्जा तथा अलीगढ़, हाथरस, सादाबाद स्थित जल प्रदूषणकारी उद्योगों में स्थापित उत्प्रवाह शुद्धिकरण संयंत्रों की स्थापना कराए।
. नदी के पानी का समय-समय पर पशु चिकित्सा विभाग द्वारा परीक्षण किया जाना चाहिए। क्योंकि काफी संख्या में पशु इस नदी का पानी पीते हैं।
वर्जन
अधिकारी जांच रिपोर्टों पर अमल नहीं करते। जब मामला गर्म होता है तो जांच करवा लेते हैं, इसके बाद इस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल देते हैं। यही वजह है कि करबन नदी को स्वच्छ रखने के लिए जो संस्तुतियां की गई थी, उन पर अमल नहीं हो पाया। नतीजा सबके सामने है। नदी अभी भी दूषित है।
- डीके जोशी, सदस्य, सुप्रीम कोर्ट अनुश्रवण समिति