भिवानी की मिट्टी से निकला एक और भाला फेंक खिलाड़ी
- 22 अक्तूबर 2001 को हरियाणा के भिवानी जिले के देवसर गांव में जन्मे यशवीर सिंह के लिए भाला फेंक कोई नया खेल नहीं था।
- उनके पिता राय सिंह खुद राष्ट्रीय स्तर के जैवलिन थ्रोअर रह चुके हैं। उन्होंने रेलवे के लिए खेला, कई खिताब जीते और बाद में रेलवे में कोच भी बने।
- उन्होंने अपने खेल जीवन में अच्छी प्रतिभा होने के बावजूद एक कमी हमेशा महसूस की, उन्हें शुरुआती दिनों में सही तकनीकी मार्गदर्शन नहीं मिल पाया।
- यही अधूरा सपना उन्होंने अपने बेटे के जरिए पूरा करने का फैसला किया।
80 मीटर क्लब में एंट्री और अंतरराष्ट्रीय पहचान
2022 में यशवीर पहली बार 80 मीटर का आंकड़ा पार करने में सफल रहे। इसके बाद उनका आत्मविश्वास लगातार बढ़ता गया। 2025 में उन्होंने एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 82.57 मीटर के साथ पांचवां स्थान हासिल किया। उज्बेकिस्तान में आयोजित जी. अर्जुमानोव मेमोरियल मीट में स्वर्ण पदक जीता और फिर विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व किया। जून 2026 में 83.72 मीटर का थ्रो कर उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए अपनी जगह लगभग पक्की कर ली।
ग्लास्गो में सामने थे दुनिया के सबसे बड़े नाम
कॉमनवेल्थ गेम्स का फाइनल आसान नहीं था। एक तरफ भारत के नीरज चोपड़ा थे, दूसरी ओर पाकिस्तान के ओलंपिक चैंपियन अरशद नदीम, ग्रेनाडा के विश्व चैंपियन एंडरसन पीटर्स और श्रीलंका के रुमेश थरंगा पथिराजे जैसे बड़े खिलाड़ी। शुरुआत में श्रीलंका के थरंगा ने 89.75 मीटर का शानदार थ्रो कर बढ़त बना ली। नीरज चोपड़ा 85.83 मीटर के साथ दूसरे स्थान पर थे। वहीं यशवीर पदक की दौड़ में तो थे, लेकिन एंडरसन पीटर्स उनसे आगे थे। उधर बड़ा उलटफेर तब हुआ, जब पाकिस्तान के स्टार अरशद नदीम शुरुआती तीन थ्रो के बाद ही प्रतियोगिता से बाहर हो गए।
जब सब कुछ आखिरी थ्रो पर टिका था...
छह राउंड की प्रतियोगिता अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी थी। यशवीर जानते थे कि अगर पदक जीतना है तो अब तक का सर्वश्रेष्ठ थ्रो करना होगा। उन्होंने लंबा रन-अप लिया। सारी ताकत और वर्षों की मेहनत उस एक रिलीज में समा गई। भाला हवा में तेजी से आगे बढ़ा। दूरी नापी गई- 85.41 मीटर।
यह उनके करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। यही थ्रो उन्हें एंडरसन पीटर्स से आगे ले गया और वह सीधे तीसरे स्थान पर पहुंच गए। स्टेडियम तालियों से गूंज उठा। भारत को नीरज चोपड़ा के रजत और यशवीर सिंह के कांस्य के रूप में ऐतिहासिक डबल पोडियम मिल चुका था।
एक थ्रो जिसने पूरी कहानी बदल दी
खेल में कई बार पूरा करियर एक पल में बदल जाता है। यशवीर सिंह के लिए वह पल ग्लास्गो का आखिरी थ्रो था। अगर वह प्रयास कुछ सेंटीमीटर भी छोटा रहता, तो शायद वह पोडियम से बाहर रह जाते। लेकिन बड़े खिलाड़ी दबाव में घबराते नहीं, बल्कि अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं। यशवीर ने भी वही किया। देवसर गांव से शुरू हुआ सफर कॉमनवेल्थ गेम्स के पोडियम तक पहुंच गया। पिता की वर्षों की मेहनत, बेटे का धैर्य और आखिरी थ्रो का साहस, इन तीनों ने मिलकर भारतीय एथलेटिक्स के इतिहास में एक नई कहानी लिख दी।