बजरंग पूनिया और विनेश फोगाट
विनेश के लिए कौशल संबंधित कोई मुद्दा नहीं है, लेकिन मजबूत प्रतिद्वंद्वी को छह मिनट तक पकड़कर रोके रखना एक बड़ी चुनौती है जिसे उन्होंने हाल में स्वीकार भी किया था। इस संबंध में बड़े स्तर की प्रतियोगिता उन्हें इसका आकलन करने में मदद करेगी क्योंकि इस पहलवान की निगाहें पहले विश्व पदक पर लगी हैं।
पिछले साल कोहनी की चोट के कारण उन्हें बुडापेस्ट चैंपियनशिप से बाहर होने के लिए मजबूर होना पड़ा था। वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत की किसी महिला पहलवान ने स्वर्ण पदक नहीं जीता है और विनेश के पास भारत के सूखे को समाप्त करने का मौका होगा।
वहीं, बजरंग अपनी सर्वश्रेष्ठ फार्म में हैं लेकिन उनके लिए एक चीज परेशानी का कारण बन सकती है और वह है उनका कमजोर 'लेग डिफेंस'। इससे उनके लिए निश्चित रूप से यह कड़ी परीक्षा हेागी।
सिर्फ सुशील कुमार ने कुश्ती के इतिहास में भारत को पुरुष फ्री स्टाइल में विश्व खिताब दिलाया है और अब बजरंग दूसरे पदक के लिए भारत के इंतजार को खत्म करने के लिए बेताब होंगे। 25 वर्षीय पहलवान ने दो वर्ल्ड चैंपियनशिप पदक हासिल किए हैं, लेकिन वह गोल्ड नहीं जीत पाए हैं। हालांकि उन्हें इसके लिए कई चुनौतियों से जूझना होगा जिसमें रूस के गदजिमुराद राशिदोव और बहरीन के हाजी मोहम्मद अली शामिल हैं।
दो बार के ओलंपिक मेडलिस्ट सुशील पिछले कुछ समय से जूझ रहे हैं और आठ साल बाद वर्ल्ड चैंपियनशिप में वापसी कर रहे हैं। 74 किग्रा में उनके प्रदर्शन पर सभी की नजरें लगी होंगी क्योंकि पिछले कुछ समय से उनके प्रदर्शन पर चर्चा हो रही है।
सुशील की तरह ही रियो ओलिंपिक की ब्रॉन्ज मेडलिस्ट साक्षी मलिक भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जूझ रही हैं। उन्होंने 2017 राष्ट्रमंडल चैंपियनशिप जीतने के बाद से कोई खिताब नहीं जीता है।
इस सत्र में डैन कोलोव पर उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दूसरा स्थान रहा था। उन्होंने वर्ल्ड चैंपियन पेट्रा ओली को हराकर उलटफेर करते हुए सिल्वर मेडल हासिल किया। वह लंबे समय से दबाव को झेलने में सहज नहीं हो पा रही हैं। बाउट के अंतिम क्षणों में रक्षात्मक होना उनके लिए मददगार नहीं हो रहा है, जिसके कारण वह कई बार अच्छी स्थिति के बावजूद हार गईं।
वहीं, दिव्या काकरान में काफी स्फूर्ती है और वह अपने मुकाबलों में अडिग रहती हैं। उन्होंने इस सत्र में दो स्वर्ण और इतने ही कांस्य पदक जीते हैं। पूजा ढांडा पिछले साल विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतने वाली केवल चौथी भारतीय महिला पहलवान बनीं।
वह 57 किग्रा में स्थान पक्का नहीं कर सकीं जो ओलिंपिक वर्ग है लेकिन अब वह 59 किग्रा में दूसरा पदक हासिल करना चाहेंगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि ट्रायल्स में पूजा को चौंकाने वाली सरिता मोर कैसा प्रदर्शन करती हैं।
पुरुष फ्रीस्टाइल पहलवानों में दीपक पूनिया कुछ उलटफेर करने में सक्षम हैं। वह 18 साल की उम्र में भारत के पहले जूनियर वर्ल्ड चैम्पियन बनने के बाद यहां पहुंचे हैं। उन्होंने ट्रायल में अपने सीनियर पहलवानों को पछाड़ा। अब सीनियर स्तर में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए उनके पास अच्छा मौका होगा। गुरप्रीत सिंह (77 किग्रा) और हरप्रीत सिंह (82 किग्रा) ग्रीको रोमन में भारत की सर्वश्रेष्ठ उम्मीद होगी।
चैंपियनशिप से तीनों शैलियों के छह वर्गों में छह ओलिंपिक कोटे मिलेंगे।
टीम: (पुरुष फ्रीस्टाइल): रवि कुमार (57 किग्रा), राहुल अवारे (61 किग्रा), बजरंग पूनिया (65 किग्रा), करण (70 किग्रा), सुशील कुमार (74 किग्रा), जितेंदर (79 किग्रा), दीपक पूनिया (86 किग्रा), परवीन (92 किग्रा), मौसम खत्री (97 किग्रा) और सुमित मलिक (125 किग्रा)। (पुरुष ग्रीको रोमन): मंजीत (55 किग्रा), मनीष (60 किग्रा), सागर (63 किग्रा), मनीष (67 किग्रा), योगेश (72 किग्रा), गुरप्रीत सिंह (77 किग्रा), हरप्रीत सिंह (82 किग्रा), सुनील कुमार (87 किग्रा), रवि (97 किग्रा) और नवीन (130 किग्रा)। (महिला फ्रीस्टाइल): सीमा (50 किग्रा), विनेश फोगट (53 किग्रा), ललिता (55 किग्रा), सरिता (57 किग्रा), पूजा ढांडा (59 किग्रा), साक्षी मलिक (62 किग्रा), नवजोत कौर (65 किग्रा), दिव्या काकरान (68 किग्रा), कोमल भगवान गोले (72 किग्रा) और किरण (76 किग्रा)।