मंजू के पिता भीम सेन की नौ साल पहले पेट के कैंसर से मृत्यु हो गई थी। वह सीमा सुरक्षा बल में हवलदार थे। ज्यादातर दूरदराज इलाकों में ही तैनात रहने वाले भीम सेन परिवार के साथ ज्यादा समय नहीं बीता पाते थे। पिता की मौत के बाद मंजू की मां इस्वती पर अतिरिक्त जिम्मेदारियां आ गईं। पति की मुट्ठी भर पेंशन के पैसों से ही घर चलाना पड़ता था। पिता की असमय मृत्यु के बाद ही मंजू ने बॉक्सिंग ग्लव्स पहने। मंजू ने बताया कि मुक्केबाजी से ही वह अपने पिता की मृत्यु के सदमे से बाहर आ सकी। बॉक्सिंग से पहले मंजू कबड्डी खेला करती।
मंजू का मुक्केबाजी में आना मात्र एक संयोग था। मंजू के पिता के दोस्त, साहब सिंह ने बच्चों को दौड़ के लिए अपने खेत के आसपास की जमीन को एथलेटिक ट्रैक का रूप दे दिया। बाद में साहब सिंह ने कुछ मुक्केबाजी वीडियो देखने के बाद, गांव की 20 लड़कियों को मुक्केबाजी के लिए आश्वस्त किया, मंजू उनमें से एक थी।
2012 में मंजू के करियर में टर्निंग आया। कोच सूबे सिंह बेनीवाल ने रोहतक में मिट्टी के गड्ढे में प्रशिक्षण ले रही लड़कियों में से मंजू को देखा। कोच ने जो देखा उससे वह बहुत प्रभावित हुए, जिसके बाद उन्होंने मंजू को प्रशिक्षण देना शुरू किया।
मंजू रानी ने स्ट्रांजा मेमोरियल बॉक्सिंग चैंपियनशिप में रजत पदक जीता, जहां वह फाइनल में फिलीपींस की जोसी गेबुको से हार गई। इंडिया ओपन में कांस्य पदक जीतने से पहले रानी ने थाईलैंड ओपन में कांस्य पदक जीता। भारतीय महिला टीम के मुख्य कोच और 2002 के कॉमनवेल्थ गेम्स के स्वर्ण पदक विजेता मोहम्मद अली कमर ने शिविर में मंजू के शुरुआती दिनों को याद किया।
उन्होने कहा कि जब वह पहली बार राष्ट्रीय शिविर में आईं थीं, तब हमें पता था कि वह एक अच्छी बॉक्सर है, लेकिन हमें बहुत सी चीजों पर काम करना था, हमने उसकी तकनीक पर बहुत काम किया, यह उसका दृढ़ संकल्प था, जो उसे दूसरों से अलग बनाता है।