सरजूबाला देवी हों या सोनिया लाथेर या फिर पवित्रा, इन तीनों ही बॉक्सरों का देश के लिए यह पहला इंटरकांटीनेंटल गेम्स है। कहने का मतलब यह है कि यह पहली बार है जब इस तरह के खेलों में मैरी कॉम और सरिता देवी के बिना महिला बॉक्सिंग में चुनौती नवोदित हाथों में है।
सरजूबाला जकार्ता में कुछ कर गुजरने के लिए बेहद उत्साहित हैं। यही कारण है कि वह अभी से ही गोल्डन रंग में रंग पड़ी हैं। दरअसल उन्होंने गोल्ड जीतने के लिए अपने बालों को स्वर्णिम रंग दे डाला है। सरजूबाला कहती हैं कि अगर गोल्ड जीतना है उसका अहसास अभी से होना चाहिए।
दरअसल, मैरी कॉम की छत्रछाया में सरजूबाला को अभी तक वह मुकाम नहीं मिल पाया है जो उन्हें मिलना चाहिए था। इसका कारण दोनों का एक ही भार वर्ग होना। दोनों ही 49 और 51 किलो में खेलती हैं। जाहिर है मैरी हैं तो मौका उन्हें ही मिलेगा, लेकिन इसका सरजूबाला को कोई पछतावा नहीं है बल्कि उन्हें खुशी है कि उन्हें हर समय इस दिग्गज बॉक्सर का साथ मिलता है। सरजू के मुताबिक मैरी की वजह से उनकी बॉक्सिंग में जबरदस्त सुधार हुआ है।
हालांकि सरजूबाला को वह दिन भी याद हैं जब उन्होंने नेशनल खेलने के लिए राज्य की टीम में चयन हासिल किया था, लेकिन राष्ट्रीय चैंपियनशिप में खेलने के लिए उनके घर वालों के पास पैसे नहीं होते थे। उनकी मां कपड़े सिलकर बेचा करती थीं। उससे जो पैसे एकत्र होते थे उनसे वह नेशनल खेलने के लिए जाया करती थीं। यही कारण है कि वह गोल्ड जीतकर मां को उसके त्याग के लिए समर्पित करना चाहती हैं।
उज्बेक और कजाख बॉक्सरों की कड़ी चुनौती
बॉक्सिंग इंडिया के अध्यक्ष अजय सिंह साफ करते हैं कि एशियाई खेल बेहद कठिन हैं। खासतौर पर यहां उज्बेकिस्तान और कजाखस्तान के मुक्केबाज हैं जो दुनिया के सबसे अच्छे बॉक्सर माने जाते हैं। अगर इनके बीच भारतीय बॉक्सरों ने अच्छा प्रदर्शन किया तो यह टोकियो ओलंपिक के लिए शुभ संकेत होंगे।
वहीं, बॉक्सर विकास कृष्ण का कहना है कि यह अब तक सबसे संतुलित बॉक्सिंग टीम है। टीम की यही कोशिश रहेगी कि इंचियोन एशियाई खेलों के प्रदर्शन को बेहतर किया जाएगा। उन्होंने इस बात की भी खुशी जताई कि इस बार टीम के साथ डॉ. करनजीत सिंह को भेजा जा रहा है। इस बार टीम को डॉक्टर के अलावा फीजियो गौरव आहलुवालिया की भी सेवाएं मिल रही हैं।