भारत शुक्रवार को अपना 69वां गणतंत्र दिवस मनाने वाला है। स्वाधीनता के बाद भारत ने खेल के क्षेत्र में कई उतार-चढ़ाव देखे। खासतौर पर महिलाओं के योगदान को देश नजर अंदाज नहीं कर सकता है।
तो आइये जानते हैं, गणतंत्र दिवस के इस अवसर पर खेल में महिला खिलाड़ियों के योगदान के बारे में...
एक समय था जब देश में महिलाओं को घर के अंदर कैरमबोर्ड और बाहर गार्डन में सिर्फ बैडमिंटन खेलने की आजादी जाती थी। लड़कियों से इस बात की आशा नहीं कि जाती थी कि यह भी किसी खेल में देश को पदक जीता सकती हैं। लेकिन वक्त के साथ समाज और सोच दोनों बदले। लेकिन यह सफर उन महिलाओं के लिए बिलकुल आसान नहीं रहा, जो देश के लिए पदक लेकर आईं।
उन महिलाओं को पहले ड्रेस कोड की सामाजिक बाधा को तोड़ना पड़ा और इसके बाद खेल प्राधिकरणों के अंदर शोषण का सामना करना पड़ा। 2016 रियो ओलंपिक महिला खिलाड़ियों के लिए क्रांतिकारी बदलाव लेकर आया। इस ओलंपिक में महिला पहलवान साक्षी मलिक ने कांस्य तो बैडमिंटन स्टार पीवी सिंधू ने रजत पदक अपने नाम किया। जबकि दीपा कर्माकर ने जिमनास्टिक जैसे कठिन खेल में चौथा स्थान हासिल किया।
रेसलिंग, बॉक्सिंग, वेट लिफ्टिंग, चक्का फेंक और जिमनास्टिक में भारतीय महिला खिलाड़ियों की ये उपलब्धियां साबित करती हैं कि वे अब पुरुषों के वर्चस्व वाले खेलों और उसमें अपने करियर को लेकर काफी गंभीर हैं। इनमें वे सिर्फ भाग नहीं लेना चाहतीं, बल्कि पदक भी जीतना चाहती हैं।
हालांकि इससे पहले 2000 ओलंपिक में कर्णम मल्लेश्वरी ने महिलाओं के 69 किलोग्राम वर्ग में भारोत्तोलन में कांस्य का पदक दिलाया, साइना नेहवाल ने बैडमिंटन में देश को दूसरा ओलंपिक पदक (कांस्य) दिलवाया और फिर 2012 के लंदन ओलंपिक ने एमसी मैरी कॉम को मुक्केबाजी में पदक दिलाया तो उम्मीदों को और बल मिला। जिस देश में कन्या भ्रूण हत्या अब भी जारी है और जहां 'बेटी बचाओ' के बाद बेटियों को पढ़ाने की ही बातें होने लगी।
अब खेल में लड़कियों का लोहा मानने के बाद केंद्र और राज्य सरकारें खेलों में पदक जीतने वाली खिलाड़ियों पर इनामों की बारिश करने लगी हैं, लेकिन यह सवाल अब भी बना हुआ है कि इन महिला खिलाड़ियों को उचित अवसर और शोषण से बचाने के लिए सरकारें किस स्तर पर कदम उठाएंगी।
2015 में हुई जिस एक घटना ने महिला खिलाड़ियों के शोषण के बारे में देश का ध्यान खींचा था, वह केरल के भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) के प्रशिक्षण केंद्र में हुई थी। केंद्र में चार उदीयमान महिला खिलाड़ियों ने आत्महत्या की कोशिश की थी, जिनमें से एक की मृत्यु हो गई थी। इन लड़कियों ने आरोप लगाए थे कि वहां उनका शारीरिक उत्पीड़न या यौन शोषण हो रहा था। जब यह शोषण उनकी बर्दाश्त से बाहर हो गया तो उन्होंने एक साथ जहरीला फल खाकर जान देने का प्रयास किया था। इस घटना से यह मुद्दा चर्चा में आया था कि किसी न किसी स्तर पर महिला खिलाड़ियों का कोई शोषण या उत्पीड़न होता है। देश में पहले भी ऐसी कई घटनाओं का खुलासा हो चुका है जब महिला खिलाड़ियों ने अपने साथ होने वाली ज्यादती के आरोप लगाए थे।
बहरहाल, इस तरह की उक्त बातों पर सरकार को ध्यान रखना होगा। वहीं, भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) को भी इसके प्रति जिम्मेदारी लेने की जरुरत है। यदि इस तरह के हालाज रहेंगे तो जाहिर सी बात है कि महिला खिलाड़ी खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ने से कतराएंगे।