नीरज कहती हैं पापा चाहते थे भाई पहलवानी में नाम कमाए। भाई हितेश भी पूरे मन से इसमें करियर बनाना चाहते थे। लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था। अभ्यास के दौरान दो बार उनका लिगामेंट टूट गया। उनकी दो सर्जरी हुई। डॉक्टरों ने उन्हें कुश्ती से दूर रहने को कहा।
इससे पापा और भाई काफी निराश हुए। उन्हें दुखी देखकर मैंने रिंग में उतरने का मन बनाया। हालांकि पापा चाहते थे कि मैं भी पहलवान बनूं। पर मैं कुछ अलग करना चाहती थी। कॉलेज के दिनों के दौरान 2012 में मुक्केबाजी की शुरुआत करने वाली नीरज कहती हैं, मैं इस दौरान कभी गांव से अकेले भिवानी भी नहीं गई थी।
मेरी कोचिंग के लिए हितेश ने भी घर छोड़ दिया। हम दोनों भिवानी आ गए। हितेश प्रैक्टिस में मेरी मदद करने लगा। अब भी मैं जहां भी प्रैक्टिस के लिए जाती हूं वह मेरे साथ होता है। मुझे किसी चीज की कमी नहीं होने देता।
नीरज ने शुरुआत 51 किग्रा से की थी। इसमें उन्होंने 2016 में गुवाहाटी में हुई राष्ट्रीय चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद 2017 में पहली बार सर्बिया में हुए छह देशों के नेशंस कप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना पहला पीला तमगा जीता।
हालांकि पिछले साल नीरज ने अपना भार वर्ग बदलकर 60 किग्रा कर लिया। वह जनवरी में असम के विजयवाड़ा में हुई राष्ट्रीय चैंपियनशिप में 60 किग्रा में ही चैंपियन बनीं। वह कहती हैं 51 किग्रा में बहुत कड़ा मुकाबला है।
नीरज कहती हैं कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गोल्डन पंच जड़ने के बाद भी गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल और जकार्ता एशियाई खेलों के लिए टीम में जगह नहीं बनाने का मुझे बहुत दुख हुआ।
मुझे लगा कि अब खेल छोड़ देना चाहिए। मैंने मन भी बना लिया था। लेकिन भाई और कोच संजय ने मुझे समझाया। उन्होंने मुझे भार वर्ग बदलने को कहा।
उनके कहने पर मैंने इसमें बदलाव किया और फिर अपनी मंजिल की और निकल पड़ी।