मीरा के मुताबिक उन्हें राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण जीतने के बाद केंद्र और राज्य सरकार से जो भी कैश अवॉर्ड मिला उससे उन्होंने इंफाल में चार कमरों का एक घर खरीदा। उनके माता पिता और भाई अभी भी गांव में ही रहते हैं, लेकिन उन्होंने इस घर में गांव और पड़ोसी गांव के गरीब बच्चों को ठहराया है।
उन्हें इंफाल में ट्रेनिंग के लिए गांव से दर दर की ठोकरें खाकर आना पड़ता था। उन्हें इंफाल में ठहरने की जगह नहीं मिलती थी क्योंकि पैसे इतने नहीं होते थे। उन्हें मालूम है कि गांव से आने वाले बच्चों को इंफाल में किस तरह की कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। इसी वजह से उन्होंने इंफाल में ट्रेनिंग करने वाले कुछ गरीब बच्चों को अपने नए घर में ठहराया है।
यही नहीं साई ने उनकी ट्रेनिंग के लिए गांव में जो प्लेटफार्म और वेटलिफ्टिंग सेट मुहैया कराया है उसे भी उन्होंने गांव के प्रतिभाशाली बच्चों के लिए खोल रखा है। वह पटियाला में एक स्कूटी खरीदना चाहती थीं लेकिन कोच ने मना कर दिया कि इसकी जरूरत नहीं है। एक साइकिल ले लो। उन्होंने यही किया। वह साइकिल से एनआईएस में इधर-उधर जाती हैं।
मीरा मानती हैं कि खेल रत्न मिलने पर उनकी अब ओलंपिक पदक के लिए जिम्मेदारी और बढ़ गई है। वह अगले वर्ष अप्रैल में एशियाई चैंपियनशिप से वापसी करेंगी। फिलहाल वह अक्टूबर माह तक मुंबई में ही हीथ मैथ्यूज के प़ास रहकर इलाज और ट्रेनिंग एक साथ करेंगी।
मीरा अवॉर्ड के लिए मां को साथ लेकर आई हैं। वह बताती हैं कि मां पहली बार मणिपुर से बाहर निकली हैं। उन्होंने मणिपुर के अलावा कुछ नहीं देखा है। उन्होंने पहली बार इतना बड़ा होटल देखा है। हालांकि उन्होंने भी कभी इंडिया गेट नहीं देखा है।
अब वह मां को लेकर इंडिया गेट जाएंगी। राष्ट्रपति भवन में अवॉर्ड कार्यक्रम के लिए मीरा को साड़ी बांधनी थी। उन्हें साड़ी पहनना अच्छा लगता है, लेकिन इसे बांधना नहीं आता है। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में कोच हंसा शर्मा ने उनकी साड़ी बांधी। यहां उनकी साड़ी बांधना का इंतजाम साई ने कराया है।