अब्दुल खालिक के बेटे ने कहा कि रावलपिंडी में मेरे पिता जी गरीबी से जूझते हुए मिल्खा सर की तरह विश्व स्तर के एथलीट बने। मेरे पिता भी सेना में शामिल हुए और ये आर्मी का ही प्रशिक्षण था कि जहां उन्हें दौड़ने का जुनून सवार हुआ। इसके बाद वह साल 1956 से लेकर 1960 तक एशिया के सबसे तेज दौड़ने वाले एथलीट रहे।
खालिक के बेटे के मुताबिक मेर पिता और मिल्खा सर की कहानी आपसे में बहुत मिलती है। उन्होंने कहा कि 1956 में मेलबर्न ओलंपिक खेलों के दौरान मेरे पिता को निराशा हुई वह 100 और 200 मीटर रेस में चौथे नंबर पर रहे। वहीं 1960 में रोम ओलंपिक के दौरान 400 मीटर दौड़ में मिल्खा जी भी चौथे स्थान पर रहे थे।
उन्होंने आगे कहा कि मैंने पहली बार मिल्खा जी से साल 2009 में बात की। उनके सचिव ने उनकी बायोपिक भाग मिल्खा भाग में मुझसे मेरे पिता के चित्रण के अधिकारों के बारे में बात की। खालिक के बेटे ने कहा कि वह जल्दी ही लाइन पर आ गए और जब मैंने कहा कि आप महान एथलीट हैं, तो उन्होंने उसके बाद जो कुछ कहा वह मुझे आज भी याद है। मिल्खा सर ने मुझसे कहा था कि बेटा तुम्हारे पिता एक महान एथलीट थे। मैं उन्हीं को हराकर फ्लाइंग सिख बना, मेरी प्रसिद्धि का कारण आपके पिता थे।
साल 1958 में टोक्यो में आयोजित किए गए एशियाई खेलों के दौरान मिल्खा सिंह ने पाकिस्तान के अब्दुल खालिक को 200 मीटर दौड़ में हराकर गोल्ड मेडल जीता था। उसके 2 साल बाद मिल्खा ने लाहौर में फिर अब्दुल खालिक को मात दी।
खालिक के बेटे ने कहा कि मेरे पिता जी बहुत कम बोलते थे। उन्होंने 1960 में लाहौर में आयोजित भारत-पाकिस्तान एथलेटिक मीट में मिल्खाजी के विरुद्ध 200 मीटर की प्रसिद्ध दौड़ में हार के बारे में शायद ही कभी बात की। इस घटना के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान मिल्खा सिंह के पास गए और उन्हें फ्लाइंग सिख का नाम दिय था। 18 जून 2021 को भारत के महान एथलीट मिल्खा सिंह का कोरोना के चलते चंडीगढ़ में निधन हो गया था।