मंजू हरियाणा की जरूर हैं, लेकिन उन्हें राज्य से खेलने के अवसर नहीं मिले तो वह पंजाब चली गईं। बीते वर्ष ही वह राष्ट्रीय स्तर पर सामने आईं, लेकिन उनके पास कोई नौकरी नहीं है। 2010 में पिता की मृत्यु के बाद मां को मिलनी वाली नौ हजार रुपये की पेंशन से परिवार चला है। मंजू कहती हैं कि उन्हें उम्मीद है कि विश्व चैंपियनशिप का यह पदक उन्हें अच्छी नौकरी दिला देगा। वह कहती हैं कि उनके बॉक्सर बनने में मां और कोच सूबे सिंह का बहुत बड़ा योगदान है। मां ने कई बार परिवार चलाने के लिए कर्ज भी लिया, लेकिन कभी इसकी भनक उन्हें नहीं लगने दी।