अंतरराष्ट्रीय खेलों के वरिष्ठ वकील एलेक्जेंड्रे मिगुएल मेस्त्रे ने कहा कि ओलंपिक आईओसी की एक्सक्लूसिव प्रॉपर्टी है। आईओसी और मेजबान टोक्यो शहर के बीच हुए अनुबंध के तहत यहां सिर्फ आईओसी ही ओलंपिक के आयोजन को रद्द कर सकता है। टोक्यो प्रशासन के पास यह अधिकार नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि यदि आईओसी को ऐसा लगे कि मेजबान शहर में युद्ध है या लॉ एंड ऑर्डर विफल है, जिससे खिलाड़ियों को खतरा है, तब वह आयोजन को रद्द कर सकता है। वैसे कोरोना महामारी को भी ऐसे खतरे के रूप में देखा जा सकता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न के प्रोफेसर जैक एंडरसन के अनुसार यदि जापान एकतरफा अनुबंध खत्म करता है तो उसे बड़े पैमाने पर नुकसान उठाना पड़ेगा क्योंकि जापान और आईओसी की ब्रॉडकास्टिंग स्पॉन्सरशिप में अरबों रुपये की हिस्सेदारी है। अनुबंध टूटने से इंश्योरेंस कंपनियां आयोजकों के प्रमुख खर्चों को कवर तो करेंगी, लेकिन वे अप्रत्यक्ष खर्चों (होटल, रेस्तरां, पर्यटन, हॉस्पिटल पर हुआ खर्च) को कवर नहीं करेंगी जिससे जापान के स्वास्थ्य और पर्यटन सेक्टर को भारी नुकसान होगा।
ओलिंपिक का आयोजन रद्द होने से जापान की साख पर भी बुरा असर पड़ेगा क्योंकि अगले साल जापान का धुर विरोधी चीन विंटर ओलंपिक का आयोजन कर रहा है। पिछली बार जापान ने 1964 में ओलिंपिक की मेजबानी की थी। तब उस आयोजन को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान के पुनर्विकास से जोड़कर देखा गया था। फिलहाल जापान लंबे समय से आर्थिक ठहराव से जूझ रहा है इसलिए इस आयोजन को देश के पुनरुत्थान के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। कई विश्लेषकों का मानना है कि बढ़ते विवाद के बाद भी टोक्यो में ओलंपिक का आयोजन होगा, लेकिन यह किस तरह से होगा इस पर अभी कुछ कहा नहीं जा सकता।