दुनिया के सबसे बड़े खेल आयोजनों में से दो के बहिष्कार की मुहिम जोर पकड़ गई है। दोनों मामलों में मेजबान देशों पर मानवाधिकारों के हनन का आरोप है। ये दोनों खेल आयोजन अगले साल यानी 2022 में होने वाले हैं।
अगले फुटबॉल विश्व कप की मेजबानी कतर करेगा। लेकिन इल्जाम है कि वहां विश्व कप के मैचों के लिए बनाए जा रहे नए स्टेडियमों के निर्माण के दौरान मजदूरों का घोर शोषण हुआ है। इनमें बहुत से मजदूर गरीब देशों से लाए गए हैं। ये मामला काफी समय से विश्व मीडिया में चर्चित है। अब टूर्नामेंट की तारीख करीब आने के साथ इस मुद्दे ने फिर से तूल पकड़ा है।
बीते हफ्ते 2022 के वर्ल्ड कप फुटबॉल के लिए यूरोपीय टीमों की क्वालीफाइंग प्रतियोगिता शुरू हुई। इस दौरान तीन देशों के खिलाड़ियों ने मानवाधिकारों के सवाल को उठाया। नॉर्वे के खिलाड़ियों ने जो टी-शर्ट पहनी, उन पर लिखा था- ह्यूमन राइट्स ऑन एंड ऑफ द पिच (खेल के मैदान के अंदर और बाहर मानवाधिकार)। जर्मनी के खिलाड़ियों की टी-शर्ट पर लिखा था- ह्यूमन राइट्स (मानवाधिकार)। जबकि नीदरलैंड्स के खिलाड़ियों ने जो टी-शर्ट पहनी थी, उन पर लिखा था- फुटबॉल सपोर्ट्स चेंज (फुटबॉल परिवर्तन का समर्थन करता है)।
कतर को जब फुटबॉल विश्व कप की मेजबानी मिली थी, तो उस पर भी विवाद हुआ था। आरोप लगा था कि कतर ने मेजबानी पाने के लिए फीफा के अधिकारियों को रिश्वत दी। उसके बाद जब निर्माण कार्य शुरू हुए, तब से विदेश से लाए गए मजदूरों की वहां अमानवीय हालत की रिपोर्टें विश्व मीडिया में छपती रही हैं। आलोचनाओं के बाद कतर ने कुछ श्रम सुधार लागू किए। लेकिन अब भी वहां मजदूरों के साथ हो रहे व्यवहार का मसला विवादों में है।
इस साल फरवरी में यहां के अखबार गार्जियन की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि बीते एक दशक में कतर में साढ़े छह हजार अप्रवासी मजदूरों की मौत खराब परिस्थितियों में काम करने की वजह से हुई है। इसे देखते हुए हाल में नॉर्वे के बड़े फुटबॉल क्लबों ने फुटबॉल विश्व कप के बहिष्कार की अपील की थी। इस मांग का समर्थन कई मानव अधिकार संगठनों ने भी किया है। इसके बावजूद ज्यादातर जानकार नहीं मानते कि यूरोपीय या अन्य देश फुटबॉल विश्व कप का सचमुच बहिष्कार करने की हद तक जाएंगे।
उधर अगले साल फरवरी में बीजिंग में होने वाले विंटर ओलंपिक्स खेलों के बहिष्कार की मुहिम भी जोर पकड़ रही है। चीन के शिनजियांग प्रांत और हांगकांग में मानवाधिकारों के कथित हनन का मसला जैसे- जैसे गरमा रहा है, पश्चिमी राजनेताओं और मानव अधिकार समूहों की तरफ से ये मांग ज्यादा जोर से उठाई जा रही है। कुछ खिलाड़ियों ने भी इस मांग को समर्थन दिया है।
जर्मनी के स्टार फुटबॉल खिलाड़ी मेसुत ओजिल ने 2019 में एक ट्विट में शिनजियांग में उइघुर मुसलमानों के कथित दमन की निंदा की थी। तब ओजिल इंग्लैंड के क्लब आर्सेलन के लिए खेलते थे। उनके ट्विट से चीन की सरकार इतनी नाराज हुई कि उसने आर्सेलन के अगले मैचों का अपने देश में प्रसारण रोक दिया। विश्लेषकों का कहना है कि चीन फुटबॉल का बड़ा बाजार है, जहां मैचों के प्रसारण पर विज्ञापन कंपनियों का काफी कुछ दांव पर लगा होता है। कुछ ही समय बाद ओजिल और आर्सेनल का नाता टूट गया। कुछ जानकारों ने शक जताया कि ऐसा चीन के दबाव में हुआ।
इसके बावजूद विंटर ओलिंपिक की स्पॉन्सर पश्चिमी कंपनियों पर स्पॉन्सरशिप रद्द करने के लिए दबाव बढ़ रहा है। उनसे कहा जा रहा है कि उन्हें कम से कम चीन की जुबानी आलोचना जरूर करनी चाहिए। लेकिन पिछले हफ्ते जिस तरह की कीमत शिनजियांग का मामला उठाने के लिए एचएंडएम कंपनी को चुकानी पड़ी, उसके बाद कंपनियों के लिए ऐसा कदम उठाना आसान नहीं है। एचएंडएम कंपनी का चीन में बहिष्कार शुरू हो गया है, जिससे उसे भारी आर्थिक नुकसान का अंदेशा है। चीन ने ये साफ संकेत दे दिया है कि उसकी आलोचना करने वाली कंपनियों को चीन के विशाल बाजार से हाथ धोना पड़ेगा।
विश्लेषकों का कहना है कि आलोचनाओं के कारण कतर दबाव में आया। उसने मजदूरों की हालत सुधारने के कदम उठाए। लेकिन चीन आलोचनाओं पर ध्यान देने के मूड में कतई नहीं है।