क्रिकेट के खेल में मुख्य तौर पर अंतरराष्ट्रीय मैचों में इस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इसके आने के बाद अंपायरों और विशेष तौर पर खिलाड़ियों को अधिक फायदा मिला है। इस तकनीक का इस्तेमाल अंपायर द्वारा किसी खिलाड़ी के आउट या नॉटआउट दिए जाने के फैसले के खिलाफ होता है। इसके माध्यम से टीमें फिल्ड अंपायर्स के फैसले को चुनौती देते हुए डीआरएस की मांग करती है। इसमें पहले तो गेंद की प्रक्षेपवक्र (Trajectory) देखी जाती है।
इस तकनीक का इस्तेमाल मुख्य तौर पर टेनिस और बैडमिंटन के खेल में होता है। इसमें एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर सिस्टम विकसित किया गया है जो गेंद के प्रक्षेपवक्र (Trajectory) को ट्रैक करता है उसे 3-डी इमेज के रूप में दिखाता है। इस सिस्टम में उच्च-प्रदर्शन कैमरों का उपयोग होता है, जो विभिन्न कोणों से गेंद को ट्रैक करते हैं। इनका इस्तेमाल अक्सर खिलाड़ी तब करते हैं जब कॉर्क के कोर्ट लाइन के अंदर या बाहर होने की आशंका हो।
इस तकनीक का इस्तेमाल एथलेटिक्स खास कर दौड़ में विजेता के चुनाव करने के लिए होता है। इसमें लगा सिस्टम ट्रैक पर प्रति सेकेंड के हिसाब से 3000 तस्वीरें लेता है जिसकी मदद से बाद में देखा जाता है कि किस खिलाड़ी ने पहले फिनिशिंग लाइन को पार किया।
फुटबॉल में इस तकनीक का इस्तेमाल पहली बार वर्ल्ड कप में हुआ था, जिसकी मदद से होंडुरास के खिलाफ मैच में फ्रांस को गोल दिया गया था। इसका इस्तेमाल यह तय करने के लिए होता है कि गेंद पूरी तरह से गोल लाइन के पार गई है या नहीं।
इसका सिस्टम का इस्तेमाल फुटबॉल के मैच में रेफरी द्वारा किया जाता है। इसे वीडियो असिस्टेंट रेफरी सिस्टम भी कहा जाता है। इसका इस्तेमाल सिर्फ गोल, रेड कार्ड, पेनल्टी जैसे मुख्य फैसलों के लिए होता है।