फुआद 36 साल बाद एशियाई खेलों में व्यक्तिगत इवेंट में पदक जीतने वाले देश के पहले घुड़सवार बने। यह खेल सेना से जुड़े लोगों का माना जाता है, लेकिन फुआद ने इस भ्रम को भी तोड़ दिया कि असैनिक इसमें कुछ नहीं कर सकते हैं। वह इस वक्त जर्मनी में प्रैक्टिस कर रहे हैं। जहां उन्हें अपने घोड़ों का खुद लालन-पालन करना होता है। फुआद खुलासा करते हैं कि वह घोड़ों को खुद दाना डालते हैं। उन्हें टहलाते हैं और फिर प्रैक्टिस करते हैं। यह बिलकुल आसान काम नहीं है,लेकिन यह उनकी अब दिनचर्या बन गई है।
फुआद के सामने सबसे बड़ी चुनौती टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने की है। अंतिम बार ओलंपिक में भारत का कोई घुड़सवार साल 2000 में खेला था। दिक्कत यह है कि फुआद को जिस घोड़े सिगुन्यूर मेडीकॉट ने जकार्ता में दो रजत पदक दिलाए थे वह बुरी तरह चोटिल हो गया है। वह किसी भी कीमत पर टोक्यो ओलंपिक नहीं जा सकता है। फुआद के पास दो अन्य घोड़े हैं। उनका कहना है कि नए घोड़े से ही वह ओलंपिक क्वालिफाई करने का लक्ष्य हासिल करेंगे।