ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में गुरुवार से एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप का आगाज हो रहा है। भारत में तीसरी बार एशियाई एथलेटिक्स स्पर्धा का आयोजन हो रहा है इससे पहले साल 1989 और 2013 में भारत इस स्पर्धा की मेजबानी कर चुका है। 6 से 9 जुलाई तक चलने वाली इस स्पर्धा में 45 एशियाई देशों के लगभग 800 खिलाड़ी अपनी चमक बिखेरते दिखाई देंगे। इनमें से कुछ स्टार बनकर हमेशा के लिए अपना नाम रिकॉर्ड बुक्स में दर्ज करा लेंगे और कुछ ओझल हो जाएंगे।
भारतीय एथेलेटिक्स का भी एशियन एथलेटिक्स स्पर्धा से गहरा नाता रहा है। इस भारत को ट्रैक एंड फील्ड स्पर्धाओं में ऐसा सितारा दिया जिसकी उपलब्धियों को आजतक और कोई दूसरा भारतीय नहीं छू पाया। इस स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करने के बाद पीटी ऊषा उडनपरी बन गईं।
1984 में लॉस एंजलिस ओलंपिक में सेकेंड के सौवें हिस्से से कांस्य पदक से चूकने वाले के बाद पीटी ऊषा को दुनिया और देश में पहचान मिली थी। लेकिन उनके मन में खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने की ललक थी। ओलंपिक में मिली निराशा को अपनी ताकत बनाकर पीटी ऊषा 1985 में इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित एशियाई चैंपियनशिप में 5 स्वर्ण और 1 कांस्य सहित कुल 6 पदक हासिल किए था। उनकी इस उपलब्धि की बराबरी आजतक कोई भारतीय नहीं कर सका था।
ऊषा ने 100m, 200m, 400m, 400m बाधा और 4 गुणा 400 मीटर स्पर्धा में स्वर्ण पदक हासिल किया था। यह उस समय एशियन चैंपियनशिप में किसी महिला खिलाड़ी द्वारा एक स्पर्धा में जीते गए सबसे ज्यादा स्वर्ण पदक थे। 100, 200 और 400 मीटर दौड़ का स्वर्ण पदक उन्होंने एशियाई रिकॉर्ड के साथ जीता था। ऊषा ने दो स्वर्ण पदक महज 35 मिनट के अंतराल में जीते थे। 4 गुणा 100 रिले में वह स्वर्ण पदक से चूक गईं। उनकी टीम को कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा था।
उनके शानदार प्रदर्शन की बदौलत पदक तालिका में भारत 10 गोल्ड, 5 सिल्वर और 7 कांस्य पदक जीतकर कुल 22 पदक के साथ दूसरे स्थान पर रहा था। वहीं चीन ने 19 गोल्ड, 15 सिल्वर और 7 ब्रॉन्ज के साथ कुल 41 मेडल जीतकर पहले स्थान पर कब्जा किया था।