ब्रोंज मेडल के साथ सतनाम (बाएं) और सलमान (दाएं)
मर जाएंगे पर बगैर मेडल वापस नहीं आएंगे, रोइंग की डबल स्कल्स स्पर्धा शुरू होने से पहले सलमान ने अपनी साथी सतनाम से यही कहा। सलमान आर्मी से हैं और सतनाम नेवी से और पहले कभी दोनों एक साथ नाव पर नहीं बैठे थे। अमेठी में पड़ते गांव ढिंगाई खैराना के रहने वाले सलमान के दिमाग में यही था अगर यहां मेडल नहीं आया तो उन्हें रोइंग फिर न छोड़नी पड़ जाए, लेकिन 1200 तक शीर्ष पर रहने के बाद दोनों कांस्य पाने में सफल रहे। पदक के साथ सलमान और सतनाम।
सलमान के लिए यह पदक संजीवनी से कम नहीं है। वह अमर उजाला को बताते हैं कि चार साल पहले उन्होंने रोइंग छोड़ दी थी, लेकिन मेजर नागेंद्र हुड्डा के समझाने पर उन्होंने वापसी की। आज सलमान के मुंह से नागेंद्र के सम्मान में शब्द कम पड़ रहे थे। उन्हें रेस के दौरान अपने पिता भी आए।
2016 में उनका डेंगू से इंतकाल हो गया था और उनकी इच्छा थी कि बेटा सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करे। पिता के इंतकाल के बाद उनके परिवार को मेवात जिला छोड़ वापस अमेठी आना पड़ा। दो साल उन्होंने दिल्ली में उबर कैब चलाई, लेकिन 2018 में वह सेना में भर्ती होने में सफल रहे।
पदक जीतने के बाद फूट-फूट कर रोए
सलमान पदक जीतने के बाद फूट-फूट कर रोए। वह कहते हैं कि उन्होंने जिंदगी भर संघर्ष किया है। उनके पिता मोहम्मद कासिम खान मेवात में पड़ते ताउडू में ट्रक की बॉडी बनाते थे। उनके जाने के बाद चीजें बदल गईं। पिता के रहते उन्होंने सेना में भर्ती के लिए परीक्षा दी थी। 2018 में जब वह कैब चला रहे थे तो एक दोस्त ने सेना में भर्ती के बारे में बताया। वह सेना में जाने में सफल रहे, जहां 2019 में उन्होंने रोइंग शुरू की।
हैंडबॉल खेलते थे सतनाम, बने रोइंग विजेता
सतनाम का यह लगातार दूसरा एशियाड पदक है। सतनाम 2016 तक हैंडबॉल खेलते थे। वह पंजाब के लिए राष्ट्रीय चैंपियनशिप भी खेले, लेकिन रोइंग खिलाड़ी स्वर्ण सिंह से प्रेरित होकर उन्होंने रोइंग शुरू की। नेवी में उन्होंने इस खेल में जड़ें जमाईं। वह कहते हैं कि जिस तरह अंतिम क्षणों में अदला-बदली हुई, उस लिहाज से यह पदक उनके लिए बड़ा है।