रियो ओलंपिक में भारत के लिए पदकों के सूखे को साक्षी मलिक ने कुश्ती में कांस्य पदक जीतकर खत्म किया और उसके 18 घंटे के भीतर ही पीवी सिंधू ने महिला एकल बैडमिंटन के फाइनल में जगह बनाकर देश को दोबारा खुश होने का मौका दे दिया। ये पल भारतीय खेल जगत के लिए ऐतिहासिक पल थे। क्योंकि इन दो महिला खिलाड़ियों ने पदक जीतकर पूरी दुनिया के सामने भारत को गर्व से खड़े होने का मौका दे दिया।
इससे पहले दीपा कर्माकर ओलंपिक की जिम्नास्टिक स्पर्धा के फाइनल में पहुंची। वह पदक से मजह .015 अंक से चूक गईं, इसके बाद ललिता बाबर ने महिलाओं की 3 हजार मीटर स्टिपल चेज स्पर्धा के फाइनल में जगह बनाई। 32 साल बाद कोई महिला ओलंपिक की एथलेटिक्स स्पर्धा के फाइनल में पहुंची थी।
ओलंपिक से बड़ा कुछ नहीं होता। इतने बड़े मंच पर भारतीय महिलाएं स्टार बन कर उभर रही हैं तो इसे भारतीय खेल जगत में आए क्रांतिकारी बदलाव के रुप में ही देखा जाएगा। लंदन से लेकर रियो तक पुरुषों से ज्यादा महिला खिलाड़ियों से ही लोगों को पदक की अपेक्षा थी। लंदन में साइना नेहवाल लोगों की आशाओं पर खरी उतरीं और अपने-अपने खेल में कांस्य पदक जीतकर वह कारनामा कर दिखाया जो आज तक कोई भारतीय पुरुष भी नहीं कर सका था। वहीं लंदन ओलंपिक में पहली बार शामिल की गई महिला मुक्केबाजी में पांच बार की विश्वचैंपियन एमसी मेरीकॉम ने पदकीय शुरुआत दी।
आज अगर देखा जाए तो क्रिकेट को छोड़कर अन्य खेलों में महिलाएं पुरुषों से बड़ी स्टार हैं, बैडमिंटन में साइना नेहवाल और पीवी सिंधु, टेनिस में सानिया मिर्जा, जिम्नास्टिक में दीपा कर्माकर, स्क्वैश में दीपिका पल्लीकल, तीरंदाजी में दीपिका कुमारी को देश के घर-घर में जाना जाता है।
रियो ओलंपिक में भारतीय महिलाओं की बराबरी कोई पुरुष नहीं कर सका, क्या इसे भारत में खेलों के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव के रुप में देखा जाए ? क्या खेलों में महिलाओं की सफलता से आने वाले समय में देश में खेलों की दशा और दिशा में सुधार होगा?