उन्होंने आगे कहा, 'हरेन्द्र सिंह के भारतीय पुरुष हॉकी टीम के चीफ कोच का पद संभालने और चैंपियंस ट्रॉफी से भारतीय टीम में वापसी से मुझे खुद को साबित करने का नया मौका मिला। चैंपियंस ट्रॉफी में हमारी टीम ने एकजुट होकर दबाव में बड़े मैचों में बेहतर प्रदर्शन किया। हरेन्द्र सर के मार्गदर्शन में हमारी टीम के नए और अनुभवी लड़के भी दबाव में बेहतर करना सीख गए हैं। हमारी मौजूदा टीम की ताकत एक इकाई के रूप में उसका जुझारू प्रदर्शन है।'
सरदार सिंह ने यह भी कहा, 'एशियाई खेलों में हमारी टीम का लक्ष्य और सोच इसमें सिर्फ और सिर्फ स्वर्ण पदक बरकरार रख कर सीधे टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वॉलिफाई करना है। यह मुश्किल जरूर है, लेकिन इसके लिए हमें एशिया की नंबर एक टीम के रूप में मैदान पर खेलना जरूरी है और हमारी टीम इसमें सक्षम है। हमारी टीम में एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक बरकरार रखने का दम है।'
वह बताते हैं, 'हॉकी क्रिकेट नहीं हैं, जहां एक टेस्ट या वन-डे मैच अथवा सीरीज में किसी एक मैच में जीरो पर आउट होने के होने के बाद अगले में सेंचुरी जडने से फिर आपको खुद को स्थापित करने का मौका मिल जाएगा। हॉकी में हर खिलाड़ी विश्व कप, ओलंपिक ,राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों जैसे चारों बड़े टूर्नामेंट का बेसब्री से इंतजार करता है। ऐसा इसलिए कि ये चारों बड़े टूर्नामेंट चार बरस के बाद आते हैं। इसके लिए हर खिलाड़ी के लिए सबसे बड़ी चुनौती खुद को चार बरस तक तैयार करने और फिट रहने की होती।'
सरदार सिंह आगे कहते हैं, 'जब मेरा नाम राष्ट्रमंडल खेलों के लिए घोषित भारतीय टीम में नहीं आया तो मैं वापस घर चंडीगढ़ लौट गया। मेरे लिए यह वाकई मुश्किल दौर था। जब आप टीम से बाहर होते हैं और भारत की नीली जर्सी में नहीं होते और अपने बाकी साथियों को मैदान पर खेलता देखते हैं तो खुद को समझा पाना खासा मुश्किल होता है। राष्ट्रमंडल खेलों के लिए तब मुझे टीम से बाहर रखने पर तब के कोच का तर्क था कि वे नए बच्चों को आजमाना चाहते हैं। यह तब के कोचों की नजर में सही फैसला हो सकता था, लेकिन मेरे लिए यह स्वीकार करना वाकई मुश्किल और झकझोर देने वाला था।'
वह बताते हैं, 'मैं राष्ट्रमंडल खेलों के बाद वापस अपने घर चंडीगढ़ लौटने के बाद भी मैं विश्व कप, एशियाई खेलों और ओलंपिक में भारत की नुमाइंदगी करने की कोई कोशिश नहीं छोड़ता चाहता था। मैंने खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से मेहनत के मजबूत करने में कसर नहीं छोड़ी। मुझे चैंपियंस ट्रॉफी के लिए जब फिर शिविर में बुलाने के बाद भारतीय टीम में शामिल किया गया तो नए बच्चों और नए कोच की रणनीति के मुताबिक खेलना एक बड़ी चुनौती था।'
स्टार मिडफील्डर ने कहा, 'चीफ कोच हरेन्द्र सर मुझ सहित टीम में लगभग हर लड़के की ताकत और कमजोरी वाकिफ हैं। मौजूदा भारतीय टीम में लगभग सभी लड़के उनके मार्गदर्शन में खेल चुके हैं। चैंपियंस ट्रॉफी में हमारी पूरी टीम में हर किसी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। गेंद को अपने कब्जे में लेने के लिए क्या जूनियर और क्या सीनियर किसी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। इसी जज्बे के बूते ही हमारी टीम लगातार दूसरी बार चैंपियंस ट्रॉफी के फाइनल में पहुंची थी। बस किस्मत ही शायद साथ नहीं थी और इसीलिए इसमें लगातार दूसरी बार खिताब जीतने से चूक गए।'
बकौल सरदार सिंह, 'चैंपियंस ट्रॉफी का यह जीवट और एक इकाई के रूप में जीवट वाला प्रदर्शन हमें एशियाई खेलों मे दमदार प्रदर्शन का भरोसा दिलाता है। एशियाई खेलों से पहले हमने पहले बांग्लादेश और दक्षिण कोरिया से दोस्ताना और न्यूजीलैंड से टेस्ट सीरीज जीत चुके हैं । खासतौर पर अपने घर में भारत की न्यूजीलैंड के खिलाफ तीन टेस्ट मैचों की सीरीज 3-0 जीत उसे खुद पर बेहतर करने का भरोसा देगी। इससे टीम प्रबंधन को टीम की खामियों को दूर करने के मौका तो मिला। इससे अब हमारे लड़के एशियाई खेलों के लिए और विश्वास के साथ उतरेंगे।'