बात बीते माह की है, लेसली क्लॉडियस अस्पताल में दाखिल थे। देश के कुछ नामी ओलंपियनों को यह खबर लगी। बस क्या था अशोक कुमार, असलम शेर खान, चार्ल्स कारनोलियस, अब्दुल अजीज जैसे पुरोधा फौरन उन्हें देखने के लिए पहुंच गए। इन कुछ लम्हों से वह इतने तरोताजा हो गए कि डॉक्टरों ने उन्हें डिसचार्ज करने का फैसला कर लिया।
ये ओलंपियन अपने साथ ‘लेस साहब’ को डिसचार्ज कराकर ले गए। इस वायदे के साथ कि अगली बार फिर कोलकाता क्लब में बैठकर गपशप करेंगे। अशोक हों या असलम उन्हें अब तक विश्वास नहीं हो रहा है कि लेस साहब अपने वायदे को नहीं निभा पाए। अशोक तो अपने गुरु तुल्य सीनियर को याद कर भावुक हो जाते हैं। वह बताते हैं कि कोलकाता में क्लब हॉकी खेलने के दौरान उनका लेस साहब से गहरा नाता बना। वह अक्सर उनके साथ कोलकाता कस्टम्स क्लब जाते थे।
अगली मुलाकात में इसी क्लब में जाने की बात कहकर उन्होंने उनसे विदा ली थी। उनसे 16 नवंबर की यह अंतिम मुलाकात यादगार थी। वह जितने बड़े खिलाड़ी थे उससे भी बेहतर इंसान थे। थे तो वह एंग्लो इंडियन लेकिन उन्हें देश की सेवा एक रियल इंडियन की तरह की। 48,52,56 और 60 के ओलंपिक खेलने वाले लेस साहब 1978 के बैंकाक एशियाई खेलों के लिए टीम के कोच थे। उन्होंने अशोक को सलाह दी कि वह ड्रिब्लिंग बहुत ज्यादा करते हैं। उन्होंने लेस साहब की इस बात पर अमल किया। इसके बाद ही वह बड़े खिलाड़ी बनें।
असलम शेर खान कहते हैं कि वह खिलाड़ी से भी बड़े एक अच्छे इंसान थे। 1974 के तेहरान एशियाई खेलों के सेमीफाइनल में उन्होंने गोल कर टीम को फाइनल में जगह दिलाई। लेकिन पाकिस्तान के खिलाफ फाइनल से पहले कोच बालकिशन सिंह ने मैनेजर लेस साहब से सलाह ली कि उन्हें मैच में खिलाना चाहिए या नहीं। लेस साहब का जवाब था उनकी पहली च्वाइस असलम होंगे। हालांकि यह मुकाबला भारत हार गया था। अजीत पाल सिंह बताते हैं कि लंदन ओलंपिक से पहले भारतीय टीम को विदाई देने वह दिल्ली आए। उस वक्त भी उनका हॉकी के प्रति जोश देखते बनता था।