फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

हॉकी के हीरो भरत छेत्री अब जनता के नेता: कभी देश बचाया था, अब लोगों का दिल जीत लिया; कलिम्पोंग में रचा इतिहास

Mon, 04 May 2026 04:45 PM IST
Swapnil Shashank स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

भारतीय हॉकी टीम के पूर्व कप्तान और ओलंपियन भरत छेत्री ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में कलिम्पोंग सीट से शानदार जीत दर्ज की है। कभी गोलपोस्ट के सामने देश के लिए दीवार बने छेत्री अब जनता के भरोसे के नए रक्षक बनकर उभरे हैं। गांव से ओलंपिक और फिर राजनीति तक उनका सफर प्रेरणादायक कहानी बन गया है।
विज्ञापन
भरत छेत्री - फोटो : Twitter
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

कभी हॉकी मैदान में गोल रोककर भारत को जीत दिलाने वाले भरत छेत्री अब चुनावी मैदान जीत चुके हैं। पश्चिम बंगाल की कलिम्पोंग विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार भरत छेत्री ने जीत हासिल कर राजनीति में दमदार एंट्री की है। यह जीत सिर्फ एक उम्मीदवार की जीत नहीं, बल्कि उस खिलाड़ी की जीत है जिसने जीवनभर दबाव में खेलना सीखा और अब जनता के भरोसे पर खरा उतरने का मौका पाया है।
विज्ञापन

जब देश के लिए दीवार बने थे भरत छेत्री
भरत छेत्री भारतीय हॉकी टीम के सबसे भरोसेमंद गोलकीपरों में गिने जाते हैं। उनका सबसे यादगार पल 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स का सेमीफाइनल था, जब इंग्लैंड के खिलाफ मुकाबला पेनल्टी शूटआउट तक पहुंच गया था। उस तनावपूर्ण मुकाबले में छेत्री ने निर्णायक बचाव किया और भारत को 5-4 से जीत दिलाई। उस दिन उन्होंने सिर्फ एक शॉट नहीं रोका था, बल्कि करोड़ों भारतीयों की उम्मीद बचाई थी। अब वर्षों बाद उन्होंने फिर जीत दर्ज की है, लेकिन इस बार मैदान हॉकी का नहीं, लोकतंत्र का था। भरत छेत्री ने भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा के रुदेन सदा लेपछा को 21,464 वोटों के अंतर से हराया। भरत को 84,290 वोट मिले, जबकि रुदेन को 62,826 वोट मिले।

छोटे गांव से ओलंपिक तक का सफर
भरत छेत्री की कहानी संघर्ष और मेहनत से भरी है। उनका जन्म कलिम्पोंग के छोटे से गांव पाययू बस्ती में हुआ। बचपन में वह फुटबॉल खेलते थे, लेकिन परिवार के एक रिश्तेदार प्रेम सिंह राणा उन्हें पटना ले गए, जहां उन्होंने हॉकी सीखनी शुरू की। उनकी प्रतिभा जल्दी पहचानी गई और वह गोलकीपर के रूप में आगे बढ़ते गए।

अंतरराष्ट्रीय डेब्यू और कप्तानी
भरत छेत्री ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत 2001 में की थी। उन्हें अक्तूबर 2011 में भारतीय राष्ट्रीय टीम का कप्तान नियुक्त किया गया। उनके नेतृत्व में भारत ने 2012 के सुल्तान अजलान शाह कप में कांस्य पदक जीता था। इस दौरान वह वर्ल्ड कप, एशियन गेम्स, कॉमनवेल्थ गेम्स और फिर 2012 लंदन ओलंपिक में हिस्सा लिया। खेल में योगदान के लिए उन्हें ध्यानचंद पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

हॉकी के बाद के प्रयास
संन्यास लेने के बाद, उन्होंने खेल के विकास पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने उत्तरी बंगाल की युवा प्रतिभाओं को निखारने के लिए कलिम्पोंग में 'भरत छेत्री अकादमी' की स्थापना की। इस दौरान उन्होंने कलिम्पोंग क्षेत्र को करीब से देखा और वहां की परिशानियां भी जानीं।

राजनीति में क्यों उतरे भरत छेत्री?
इस दौरान बेरोजगारी, पानी की कमी, पार्किंग संकट और खराब ढांचे जैसी दिक्कतों ने भरत छेत्री को झकझोर दिया। उन्होंने 'द टेलीग्राफ ऑनलाइन' से कहा था, 'मैं मूलभूत समस्याएं जैसे पार्किंग, पानी की कमी, पीने के पानी और बेरोजगारी का समाधान करना चाहता हूं। बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में पहाड़ छोड़ रहे हैं, मैं इस पलायन को रोकने की कोशिश करूंगा।' यही मुद्दे उनकी राजनीति की पहचान बने। मार्च 2026 में, छेत्री को पश्चिम बंगाल के कलिम्पोंग विधानसभा क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार घोषित किया गया।

Bharat Chetri: We have the best players in the world

खेल का अनुशासन, राजनीति की नई परीक्षा
भरत छेत्री ने चुनाव से पहले कहा था, 'खेल में आप तैयारी करते हैं, ट्रेनिंग करते हैं और फिर खेलते हैं। यहां हर दिन अलग मुकाबला है, लेकिन मैं अलग परिस्थितियों का सामना करने का आदी हूं।' उनकी यही सोच जनता को पसंद आई। लोगों ने उन्हें सिर्फ खिलाड़ी नहीं, ईमानदार और मेहनती चेहरा माना। उन्होंने गोरखा प्रादेशिक प्रशासन (GTA) को चुनौती दी है। उनका लक्ष्य एक टीम का मार्गदर्शन करने से आगे बढ़कर अब अपने निर्वाचन क्षेत्र का विकास करना और जनता का प्रतिनिधित्व करना है।

कलिम्पोंग ने क्यों किया भरोसा?
कलिम्पोंग की जनता लंबे समय से विकास, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की मांग करती रही है। ऐसे में जब स्थानीय बेटे और राष्ट्रीय खिलाड़ी भरत छेत्री मैदान में उतरे, तो लोगों ने उनमें बदलाव की उम्मीद देखी। उनकी सादगी, स्थानीय जुड़ाव और देश के लिए खेल चुके चेहरे की पहचान ने उन्हें बढ़त दिलाई।

अब असली मुकाबला शुरू
चुनाव जीतना पहला कदम है। अब भरत छेत्री के सामने असली चुनौती जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने की है। मैदान में गोल रोकना आसान था, लेकिन राजनीति में समस्याएं रोकना कठिन होगा। फिर भी, जो खिलाड़ी दबाव में मुस्कुराकर खड़ा रहा हो, उससे जनता को उम्मीदें जरूर रहेंगी।
विज्ञापन

एक जीत, कई संदेश
भरत छेत्री की जीत यह साबित करती है कि खेल सिर्फ मेडल नहीं देता, नेतृत्व भी देता है। गोलपोस्ट से विधानसभा तक पहुंचने वाला यह सफर युवाओं को संदेश देता है कि मेहनत और ईमानदारी से हर मैदान जीता जा सकता है। खेल की दुनिया के शीर्ष स्तर से निकलकर अब वह स्थानीय राजनीति में कदम रख चुके हैं। अब वह वर्षों के खेल अनुभव के बाद जमीनी स्तर के विकास की चुनौतियों का सामना करते हुए दिखाई देंगे।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें