मेजर ध्यानचंद हॉकी जगत का एक ऐसा नाम है जिसने हॉकी को पूरे विश्व में एक अलग पहचान दिलाई। ध्यानचंद हॉकी के इस कदर दीवाने थे कि वह पेड़ से हॉकी के आकार की लकड़ी काटकर उससे खेलना शुरू कर देते थे। उनको हॉकी के आगे कुछ याद नहीं रहता था। हॉकी के सामने वह पढ़ाई को भी भूल जाते थे। अक्सर ध्यानचंद की बराबरी फुटबाल के जादूगर पेले और क्रिकेट के सर्वकालिक महान बैट्समैन डॉन ब्रैडमैन से की जाती है। ऐसा माना जाता है कि जब वह हॉकी स्टिक के साथ मैदान में उतरते थे तो गेंद हॉकी स्टिक से चिपक जाती थी। ध्यानचंद में खेल की प्रतिभा के साथ साथ अनुशासन का एक लंबा अध्याय भी था।
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1933 में एक बार वह रावलपिण्डी में मैच खेलने गए। इस घटना का जिक्र हम यहां इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इस समय हॉकी के खेल में खिलाड़ियों में अनुशासनहीनता की भावना बढ़ती जा रही थी और खेल के मैदान में खिलाड़ियों के बीच काफी तेजी आ जाती थी।
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ये उस समय की बात है जब रावलपिंडी में 14 पंजाब रेजिमेंट, जिसमें ध्यानचंद भी शामिल थे और सैपर्स एण्ड माइनर्स टीम के बीच मैच खेला जा रहा था। उस समय ध्यानचंद की ख्याति चरम सीमा पर पहुंच चुकी थी। उन्होंने अपने शानदार खेल के प्रदर्शन से विपक्षियों को को छिन्न-भिन्न कर दिया और दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया था।
इस पर विरोधी टीम का सेंटर-हाफ अपना संतुलन खो बैठा और असावधानी में उसके हाथों ध्यानचंद की नाक पर चोट लग गई। हालांकि उस समय खेल को तुरंत रोक दिया गया। प्राथमिक चिकित्सा के बाद ध्यानचंद अपनी नाक पर पट्टी बंधवाकर मैदान में लौटे। उन्होंने चोट मारने वाले प्रतिद्वंदी की पीठ थपथपाई और मुस्कराकर कहा, 'सावधानी से खेलो ताकि मुझे दोबारा चोट न लगे।'
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हालांकि उसके बाद ध्यानचंद प्रतिशोध पर उतर आए। उनका प्रतिशोध कितना आदर्श भरा था, इसकी बस कल्पना ही की जा सकती है। प्रतिशोध स्वरूप उन्होंने एक साथ 6 गोल कर दिए। ये सचमुच एक महान खिलाड़ी का गुण है।
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