स्कूल की लड़ाइयों से बॉक्सिंग रिंग तक
15 अप्रैल 2000 को हरियाणा के रोहतक के पास रुड़की गांव में जन्मीं परवीन का परिवार आर्थिक मुश्किलों से जूझता था। उनके पिता लखपत सिंह स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण भारी काम नहीं कर पाते थे। परिवार की आमदनी जमीन और भैंस के दूध की बिक्री से चलती थी। स्कूल में परवीन पढ़ाई में अच्छी थीं और उन्हें क्लास मॉनिटर भी बनाया गया था। लेकिन उनका स्वभाव तेज था। वह अक्सर अपनी कक्षा के लड़कों से भिड़ जाती थीं। कुछ लड़ाइयों में हारने के बाद उनके मन में विचार आया कि अगर लड़ना है तो सही तरीके से लड़ना सीखना चाहिए।
2011 में गांव के सरपंच सुधीर हुड्डा ने युवाओं को नशे और बेरोजगारी से दूर रखने के लिए मुफ्त हैंडबॉल और बॉक्सिंग अकादमी शुरू की। टीवी पर मैरी कॉम और विजेंदर सिंह जैसे मुक्केबाजों को देखकर परवीन पहले ही प्रभावित थीं। उन्होंने पिता से अकादमी जाने की अनुमति मांगी और यहीं से उनका बॉक्सिंग सफर शुरू हुआ।
25 किलो से भी कम वजन, ग्लव्स खरीदना भी मुश्किल
जब परवीन ने बॉक्सिंग शुरू की, तब उनका वजन 25 किलो से भी कम था। वह इतनी छोटी थीं कि कई बार कोच भी उन्हें नजरअंदाज कर देते थे। परिवार के लिए बॉक्सिंग ग्लव्स खरीदना भी आसान नहीं था। लेकिन रिंग में उनकी तेजी अलग नजर आती थी। वह विरोधी को आगे आने देतीं, उसके पंच से बचतीं और फिर तेजी से काउंटर करती थीं। धीरे-धीरे यही उनकी बॉक्सिंग शैली की पहचान बन गई।
2019 में मिली बड़ी पहचान
परवीन को बड़ी पहचान 2019 में मिली, जब सीनियर नेशनल ट्रायल्स में उन्होंने अनुभवी मुक्केबाज सरिता देवी को हरा दिया। इसके बाद उनका अंतरराष्ट्रीय सफर तेजी से आगे बढ़ा। 2019 में उन्होंने नेपाल में दक्षिण एशियाई खेलों का स्वर्ण जीता। 2021 में वह 63 किग्रा वर्ग में सीनियर नेशनल चैंपियन बनीं। 2022 में उन्होंने इस्तांबुल में आईबीए महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में कांस्य और जॉर्डन में एशियाई बॉक्सिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता।
838 दिन बाद फिर पहने बॉक्सिंग ग्लव्स
परवीन ने हार नहीं मानी। प्रतिबंध के दौरान उन्होंने खुद को दोबारा तैयार किया और वजन वर्ग बदलने का फैसला किया। 2025 वर्ल्ड बॉक्सिंग कप फाइनल्स में उन्होंने 838 दिन बाद अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग में वापसी की। 60 किग्रा वर्ग में उतरते हुए उन्होंने स्वर्ण पदक जीता। यह सिर्फ एक टूर्नामेंट में वापसी नहीं थी। यह उस मुक्केबाज की वापसी थी, जिसने अपना एशियन गेम्स पदक खोया था, ओलंपिक का सपना टूटते देखा था और करीब दो साल तक अंतरराष्ट्रीय रिंग से दूर रही थी।
एशियन गेम्स में फिर आया वही जुनून
2026 एशियन गेम्स में परवीन 65 किग्रा वर्ग में उतरीं। यहां उन्होंने एक-एक मुकाबला जीतकर फाइनल का टिकट हासिल किया। क्वार्टर फाइनल में उनका सामना उज्बेकिस्तान की नवबखोर खामिदोवा से हुआ। परवीन ने शानदार प्रदर्शन करते हुए मुकाबला 5-0 से जीता और पदक पक्का किया। इसके बाद सेमीफाइनल में चीन की ली शू उनके सामने थीं। परवीन ने यहां भी दबदबा बनाए रखा और 5-0 की जीत के साथ फाइनल में जगह बनाई। अब उनके सामने सिर्फ एक मुकाबला था और दांव पर एशियन गेम्स का स्वर्ण पदक।