छेत्री कहते हैं, 'मैं आज जहां भी पहुंचा हूं उसका पूरा श्रेय मेरे -माता को है। मेरी मां नेपाल में अपनी बहनों के साथ फुटबॉल खिलाड़ी खेली है। मैं इसलिए खुल कर फुटबॉल खेल पाया। आज मुझसे यह सवाल बराबर किया जाता है कि हम वल्र्ड कप फुटबॉल में कब खेलेंगे? भारत के ओलंपिक में कम मेडल जीतने का रोना भी रोया जाता है। मैं हकीकत में जीना पसंद करता हूं। हमें भारत के फुटबॉल वल्र्ड कप में खेलने के ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए पहले एशिया में टॉप 10 में आने की बाबत सोचना चाहिए। हमला अगला लक्ष्य भी यही होना चाहिए। बेशक जापान और दक्षिण कोरिया एशिया की दो शीर्ष टीमें हैं। धीमे-धीमे कदम बढ़ाकर फिर एशिया की टॉप पांच टीमों। जब हमारी भारतीय टीम एशिया में अपना एक अलग मुकाम पा लेगी तभी वह यूरोप की धुरंधर टीमों के खिलाफ खेलने के लिए खुद को तैयार कर पाएगी।'
छेत्री ने आगे बातचीत में कहा, 'हमारे देश में प्रतिभा है लेकिन जरूरत उसे निखारने के लिए फुटबॉल के एक बेहतर ढांचे, कोचिंग और मार्गदर्शन की जरूरत है। जहां तक अगले साल होने वाले एएफसी एशियन कप की बात है तो इसमें बढिय़ा प्रदर्शन के लिए इससे पहले हमें घर से बाहर अपने से उंची रैंकिंग वाली टीमों के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय मैच खेलने की जरूरत है। हमारी टीम का अपने घर में तो रिकॉर्ड बेहतर है लेकिन घर से बाहर हमारी टीम को ज्यादातर संघर्ष करना पड़ता रहा है। मुझे उम्मीद है कि आने वाले महीनों में हमें अपने घर से अपने से बेहतर प्रतिद्वंद्वी टीमों के खिलाफ खेलने का मौका मिलेगा औैर इसमें हम यह आंक सकेंगे कि हकीकत में हम कहां खड़े हैं। टीम में पहली एकादश से बाहर जब भी रिजर्व में रहने वाले खिलाडिय़ों को मौका दिया जाता है तो वे कसौटी पर होते हैं। ऐसे में उन्हें कुछ तो छूट देनी होगी और बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित करना होगा। मौका पाकर ही रिजर्व बेहतर खेलेंगे। रही बात ओलंपिक में ज्यादा मेडल जीतने की तो यह तभी होगा जब हम भारत में खेल की संस्कृति विकसित कर पाएंगे।'
उन्होंने आगे कहा, 'जहां तक आईएसएल और आई लीग की बात है तो मैं देश में एक ही एकीकृत लीग का समर्थक हूं। हालांकि इस बाबत कोई भी फैसला लेने का हक केवल एआईएफएफ को ही है। देश में एक ही एकीकृत लीग के बाद बाकी टीमों को विभिन्न अन्य ए और बी डिविजन में बांट दिया जाए तो भारतीय फुटबॉल बेहतर होगी।’