यकायक उसके गले में लटक रहे परिचय-पत्र पर नजर चली गई तो देख कर यकीन करना पड़ा कि लिखा था ‘इंदिरा’। वह यहां अखबार में खेल संपादक है, करीब सात साल से। पूछ लिया ‘ये इंदिरा नाम ही है ना?’ वह हंस दी और बोली-अभी एक बांग्लादेशी ने भी यही सवाल किया था कि नाम इंदिरा ही है ना! मुझे अच्छा लगता है जब कोई नाम की वजह से मुझसे सवाल करता है।
‘तो तुम जानती हो ये नाम किसका है?’ उसने बताया यह नाम मुझे मेरी मां ने दिया है। जब वे मेरी उम्र की थीं, तब भारत की प्राइम मिनिस्टर इंदिरा (गांधी) थीं। मेरी मां ने जब उनकी तस्वीर देखी थी तो उन पर फिदा हो गईं थी। उनका कहना था कि इतनी खूबसूरत महिला नहीं देखी। उस समय दुनिया में उनका बड़ा नाम था और जहां भी जाती थीं, उनकी तस्वीरें छपती थीं तो मेरी मां काट कर रख लेती थीं।
यूं कह सकते हैं इंदिरा के चित्रों का म्यूजियम बना रखा था मां ने। शादी के बाद उन्होंने मेरे पिता से यही वादा लिया था कि अगर पहली संतान बेटी हुई तो उसका नाम इंदिरा रखेंगे। पिता को भी मालुम था कि इंदिरा के लिए मां के मन में कितना दीवानापन है। पहली संतान लड़की ही हुई, तो बस मां ने इंदिरा नाम रख दिया।
‘यहां के लोगों को यह नाम कुछ अलग नहीं लगा?’ पूछा तो इंदिरा ने बताया- हां, शुरू में मुझसे सवाल पूछे जाते थे कि ये कौन है, क्या है, नाम कहां से आया, लेकिन बाद में सभी की आदत में आ गया। अब आसपास वाले तो नहीं पूछते हैं, लेकिन एशियाई देशों के लोग इस नाम पर एकदम चौंक पड़ते हैं और पूछने लगते हैं।
पाकिस्तान के लोग भी पूछते हैं कि ये नाम क्यों? इंदिरा को अपनी मां के दिए इस नाम से प्यार है। ‘और किसी का नाम पता है इंदिराजी के परिवार से?’ तो इंदिरा ने कहा- नहीं, और नाम नहीं मालुम, बस यही नाम पता है ‘इंदिरा’।