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भ्रष्टाचार और गिरफ्तारी के बीच ब्लाटर पांचवीं बार बने फीफा के बॉस

Sat, 30 May 2015 12:43 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
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विश्व के सबसे पसंदीदा खेल फुटबॉल पर भ्रष्टाचार स्कैंडल के बाद उठे विरोध के सुरों के बीच भी फीफा अध्यक्ष सैप ब्लाटर लगातार पांचवीं बार कुर्सी पर काबिज हो गए।
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ज्यूरिख में हुए 209 सदस्यीय फीफा की कांग्रेस में 79 साल के ब्लाटर ने जॉर्डन के प्रिंस अली बिन अल हुसैन को पहले चरण में 73 के मुकाबले 133 वोटों से पराजित कर दिया। फीफा को भ्रष्टाचार मुक्त करने का वादा लेकर मैदान में उतरे प्रिंस अली बिन अस हुसैन की अपील सदस्यों पर ज्यादा असर नहीं डाल सकी जबकि वैश्विक फुटबॉल संस्था को भ्रष्टाचार के बड़े आरोपों से जकड़ी नजर आ रही है।

एक तरफ अमेरिकी और स्विस एजेंसियां रिश्वत के आरोपों की जांच कर रही हैं। जब मतदान हो रहा था तब फीफा के कुछ अधिकारी हिरासत में थे।

प्रिंस अली ने 73 वोट हासिल कर चुनाव को दूसरे चरण के लिए बढ़ा जरूर दिया था लेकिन इससे पहले कि दूसरा चरण होता प्रिंस अली ने हार स्वीकार कर ली।

चुनाव से पहले कांग्रेस में अपने संबोधन के दौरान ब्लाटर ने खेल को शर्मिंदगी और अपमान के दौर से गुजरने के लिए दूसरों को दोषी ठहराया। उन्होंने कहा कि उनके या फीफा के लिए हरेक पर नजर रखना नामुमकिन है और फुटबॉल में जो खराब हुआ उसके लिए उन्हें कसूरवार नहीं ठहराया जा सकता।
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अगले 4 साल के लिए फिर से फीफा के बॉस बने ब्लाटर ने यह जीत यूफा अध्यक्ष माइकल प्लाटिनी और अन्य के इस्तीफे की मांग के बावजूद दर्ज की है। यहां तक कि प्रायोजक भी भ्रष्टाचार स्कैंडल से खासी नाराजगी जता चुके हैं। वीसा जैसे बड़े प्रायोजक ने तो अपना अनुबंध वापस लेने की धमकी भी दी है।

कैसे होता है चुनाव: फुटबॉल की वैश्विक संस्था फीफा के 209 सदस्य हैं। फीफा की कांग्रेस के दौरान प्रतिद्वंद्वियों को अपनी बात रखने का मौका मिलता है। वोटिंग के दौरान किसी उम्मीदवार को दो-तिहाई यानी 140 वोटों की जरूरत होती है। अगर पहले चरण में फैसला नहीं होता तो दूसरा चरण होता जिसमें स्पष्ट बहुमत हासिल करने वाला जीत दर्ज कर लेता है।

कौन है प्रिंस अली: जॉर्डन के प्रिंस अली बिन अल हुसैन पिछले चार सालों से एशिया से फीफा के उपाध्यक्ष रहे हैं। वह किंग हुसैन के बेटे हैं।

फीफा से जुड़ी कुछ खास बातें

पिछले चालीस सालों से दो व्यक्ति ही फीफा की शीर्ष कुर्सी पर विराजमान रहे। पहले ब्राजील के जोओ हेवलेंग जो 24 साल रहे और फिर स्विस सेप ब्लाटर पिछले 17 सालों से हैं।

सैप ब्लाटर कुल 23 सालों से फीफा में विभिन्न भूमिका निभाते रहे हैं। 1975 में टेक्निकल प्रोगाम के डायरेक्टर के रूप में जुड़े फिर महासचिव और सीआईओ भी बने और उसके बाद 8 जून 1998 से फीफा के अध्यक्ष।

1975 में जब ब्लाटर फीफा से जुड़े थे तब प्रिंस अली बिन अल हुसैन का जन्म भी नहीं हुआ था।  

2002 के बाद पहली बार ब्लाटर को चुनाव में कुछ हद तक टक्कर मिली।

जॉर्डन के प्रिंस अली के अलावा पुर्तगाल के पूर्व फुटबॉल स्टार लुइस फिगो और नीदरलैंड फुटबॉल संघ के अध्यक्ष माइकल वॉन प्राग भी फीफा अध्यक्ष की रेस में शामिल थे लेकिन उन्होंने प्रिंस अली के समर्थन में नाम वापस ले लिया था।
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कब-कब रहे ब्लाटर फीफा के अध्यक्ष

1998 पेरिस: फीफा कांग्रेस में सैप ब्लाटर ने स्वीडन के जानसन को 111-80 से पराजित किया। दूसरे चरण से पहले ही जानसन ने अपनी हार स्वीकार कर ली थी।

2002 सिओल: ब्लाटर को कैमरून के इसे हेआतू से चुनौती मिली जोकि अफ्रीकन फेडरेशन के अध्यक्ष भी थे। ब्लाटर 139-56 से जीत दर्ज करने में सफल रहे।

2007 ज्यूरिख: जोसफ सेप ब्लाटर को कोई चुनौती नहीं मिली और वह निर्विरोध लगातार तीसरे कार्यकाल के लिए अध्यक्ष बन गए।

2011: एशियन कंडरेशन के अध्यक्ष कतर के मोहम्मद बिन हम्माम ने ब्लाटर के खिलाफ मैदान में उतरने का फैसला किया लेकिन चुनाव से पहले उन पर वोटों के लिए पैसे बांटने का आरोप लगा और वह चुनाव से हट गए। हालांकि इंग्लैंड एसोसिएशन ने चुनाव का विरोध किया और चुनाव टालने की कोशिश की लेकिन ज्यूरिख में हुई कांग्रेस में उसका प्रस्ताव 206 में से 172 वोटों से गिर गया। ब्लाटर फिर अध्यक्ष बन गए।

2015: ब्लाटर ने जॉर्डन के प्रिंस अली बिन अल हुसैन को पराजित किया। पहले राउंड में ब्लाटर को 133 और प्रिंस अली को 73 वोट मिले थे। पहले चरण में बहुमत के लिए ब्लाटर को दो-तिहाई बहुमत की जरूरत थी। इस स्थिति में इससे पहले कि दूसरा चरण होता प्रतिद्वंद्वी प्रिंस अली ने नाम वापस ले लिया।
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