महान फुटबॉलर पीके बनर्जी ने 1962 में एशियाई खेलों में स्वर्ण जीतकर अपने कैंसर पीड़ित कोच सैयद अब्दुल रहीम की बड़ी हसरत पूरी की थी। फुटबॉल जगत में गुरु-शिष्य परंपरा की इस बेहतरीन दास्तां को अब फिल्मी पर्दे पर उतारा जाएगा। फुटबॉल के बेहतरीन उस्ताद माने जाने वाले रहीम ने अपने शिष्य पीके बनर्जी से गोल्ड मेडल का तोहफा मांगा था।
बनर्जी ने दक्षिण कोरिया के खिलाफ 2-1 से मिली जीत में पहला गोल दागा था। बनर्जी अपने गुरु का बड़ा सम्मान करते थे। कैंसर के कारण रहीम को ड्रेसिंग रूम में खून की उलटी भी हुई थी। जीत के बाद रहीम ड्रेसिंग रूम में नहीं थे लेकिन बनर्जी की नजरें उन्हीं ही खोज रही थी और जब उन्हें देखा तो दौड़कर उनके पास पहुंचे। दर्द के बावजूद रहीम ने अपने शिष्य को गले से लगा लिया और उनकी आंखों से मानो आंसू का दरिया बह निकला। दोनों फूट-फूटकर रोए।
फिल्म के डायरेक्टर अमित शर्मा ने फिल्म के सिलसिले में पीके बनर्जी को साल्टलेक स्थित अपने निवास पर बुलाया था। बनर्जी ने कहा कि ऐसी बायोपिक बहुत विलक्षण होती हैं। इसकी कहानी लोगों के दिलों को छूने में सफल होगी। एक बार फिर से भावुक हो उठे पीके ने कहा, वह जानते थे कि उन्हें कैंसर है और वह ज्यादा दिन नहीं जी पाएंगे तो उनकी अंतिम हसरत थी कि टीम गोल्ड मेडल जीते।
उन्होंने मुझसे कहा था, 'मुझे एक आखिरी तोहफा चाहिए, एशियन गेम्स जीतकर दो।' मैच से पहले मैंने एक बुरा ख्वाब भी देखा। टीम लीग मैच में दक्षिण कोरिया से हारी भी थी। इस बार अपने कोच को निराश नहीं करना चाहते थे। लिहाजा सारी टीम बेहतर करने के लिए दृढ़ संकल्पित थी। पीके कोच रहीम के पसंदीदा शिष्यों में से थे और उनके गोल करने की कला के कारण कोच ने उन्हें उस्ताद के नाम से पुकारते थे क्योंकि वह मानते थे कि पीके अगर गोल करने की ठान ले तो फिर उसे कोई नहीं रोक सकता।
एक बार का खाना मेरी ओर से
पीके के पास शुरुआत में सुबह-शाम दोनों बार खाने के पैसे तक नहीं हुआ करते थे। बनर्जी बताते हैं जब यह बात रहीम साहब को पता लगी तो उन्होंने मुझे बुलाकर कहा, आज से एक टाइम के खाने के पैसे मुझसे लिया करो। रहीम की कोचिंग में दो बार एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीते। इसके अलावा 1956 मेलबर्न ओलंपिक में चौथा स्थान दिलाया था।