सेंट पीटर्स बर्ग के नामी हरमीटेज म्यूजियम के सामने लंबा-चौड़ा मैदान है, जहां एक वक्त में हजार-पांच सौ का जमावड़ा तो आम बात है। यहीं एक बैंच पर बैठा था कि पास में दो मोटे-मोटे कबूतर आकर बैठ गए। लंदन में तो ऐसा होना आम बात है, लेकिन यहां पहली बार ऐसा देखा तो थोड़ा अचरज भी हुआ।
थोड़ी ही देर में एक लड़का आया, उसने सीटी बजाई और दोनों कबूतर उड़ते हुए उसके कंधे और सिर पर बैठ गए। लड़के यानी माशा से बात की तो उसने बताया 'ये कबूतर ही उसका घर चलाते हैं। यहां शनिवार-रविवार अच्छी कमाई हो जाती है कि ज्यादा भीड़ आती है।' कबूतर से कमाई की बात कुछ समझ नहीं आई तो उसने कहा 'आप खुद ही देख लेना।'
थोड़ी ही देर में एक युवा जोड़ा आया और कबूतरों ने उनके सिर और कंधों पर कब्जा कर लिया। ये जापानी थे और इन्हें इसमें मजा आने लगा था। मौके पर चौका मारते हुए माशा ने दोनों को साथ खड़ा कर कबूतर उनके हाथ में पकड़ाए और कहा, 'जो भी इच्छा हो... मांग लो। अगर कबूतर उड़ गए तो मुराद पूरी हो जाएगी।'
अब जापानी जोड़ा तो कबूतर के जाल में फंस गया था, बल्कि उन्हें मजा आने लगा था। वे तरह-तरह से फोटो उतरवा रहे थे, उतार रहे थे। इस सब में करीब दस मिनट माशा और कबूतरों के खर्च हुए और माशा ने उस जोड़े से पूरे पांच सौ रूबल झटक लिए।
माशा ने बताया 'कबूतर के साथ फोटो खिंचवाने के सौ-डेढ़ सौ रूबल, कबूतरों को शरीर पर बैठा कर तस्वीर ली है, तो ढाई सौ और उनसे कोई इच्छा या विश पूछी है तो एकमुश्त पांच सौ रूबल। कबूतर कुछ नहीं कहते, लेकिन माशा उनकी तरफ से जवाब देता है कि शादी हो जाएगी... ये साथ लंबा चलेगा या फुटबॉल के फाइनल में कौन-सी टीम जीतने वाली है।'
विश्व कप शुरू हुआ तो फुटबॉल पर ही लोगों का ध्यान था, तो हमने कबूतरों के जरिये भविष्यवाणी करना शुरू किया। उस समय तो वाकई समय कम पड़ता था। हर कोई अपनी टीम की जीत के लिए दांव खेल रहा था... और हमारा क्या जा रहा था। उन्हीं की टीम को जितवा रहे थे। नतीजों को जानने यहां लोग आ रहे हैं। दोनों हाथ में से किसी एक कबूतर को चुनना होता है। जो पहले उड़ जाएगा, वही टीम जीतेगी।
'कोई मैच देखा क्या?' पूछा तो माशा ने बताया 'यह हमारा वर्ल्ड कप था, धंधे का समय था। एक दिन भी जाया नहीं कर सकते। क्योंकि, बस एक महीना ही है, जिसकी कमाई से पूरा साल घर खर्च चलाना है।' कहते हुए माशा अपने कबूतरों को दाने डालने लगा... नए ग्राहक की तलाश में!