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फीफा विश्व कप 2018 : आखिर ब्राजील के महान फुटबॉलर का नाम पेले कैसे पड़ा? जानिए रोचक कहानी

Tue, 19 Jun 2018 12:02 AM IST
स्पोर्ट्स डेस्क, नई दिल्ली
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वर्ल्डकप फुटबॉल की सबसे कामयाब टीम ब्राजील ने रविवार को स्विटजरलैंड के खिलाफ मैच से अपने अभियान की शुरुआत की। उम्मीद के उलट यह मुकाबला 1-1 से ड्रा रहा। ब्राजील की टीम अपने घरेलू मैदान पर 2014 में उम्मीद से कमतर प्रदर्शन कर पाई थी और उसे चौथे स्थान से संतोष करना पड़ा था, लेकिन विश्वकप फुटबॉल की सबसे कामयाब टीम ब्राज़ील ही है।

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पांच बार की विश्व विजेता ब्राजील की इस कामयाबी में जिस खिलाड़ी का सबसे बड़ा योगदान है, दुनिया उन्हें पेले के नाम से जानती है। फुटबॉल के जादूगर कहलाने वाले पेले का करिश्मा कुछ ऐसा रहा है जिसकी बराबरी आज तक कोई फुटबॉलर नहीं कर पाया है। उनकी मौजूदगी में ब्राजील ने 1958, 1962 और 1970 में फुटबॉल का विश्व कप जीता था।

तीन वर्ल्ड कप हासिल करने वाले पेले दुनिया के इकलौते फुटबॉलर हैं। इसके साथ ही सबसे कम उम्र में विश्व कप में गोल दागने, हैट्रिक बनाने और फाइनल मुकाबला खेलने का रिकॉर्ड 60 साल बाद भी पेले के नाम पर बना हुआ है। पेले के करिश्मों जितनी ही दिलचस्प कहानी उनके नाम की भी है। सबसे दिलचस्प बात तो यही है कि दुनिया भर में पेले के नाम से मशहूर शख्स का ना तो नाम पेले था और ना ही निकनेम।

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हर इंसान के एक-दो निकनेम

ब्राजील के छोटे से शहर मिनास गेराइस में 23 अक्टूबर, 1940 को पेले का जन्म हुआ था। पिता क्लब स्तर के फुटबॉलर थे और मां हाउसवाइफ। मां बाप ने अपने बेटे का नाम एडसन रखा था। इस नाम को रखने की वजह के बारे में पेले ने अपने संस्मरण 'व्हाई सॉकर मैटर्स' में बताई है, 'जिस वक्त मेरा जन्म हुआ था, ठीक उसी दौरान हमारे शहर में बिजली का बल्ब पहुंचा था, मेरे माता-पिता बल्ब की रोशनी से अभिभूत थे, तो उन्होंने इसे बनाने वाले थामस एल्वा एडिसन के सम्मान में मेरा नाम रखा एडिसन रखा पर गलती से वो स्पेलिंग में आई शब्द नहीं रख पाए।'

इस तरह से पेले का नाम हो गया एडसन। पूरा नाम एडसन एरेंटस डो नासिमेंटो। ब्राज़ील में इसी तरह से नाम लंबे चौड़े रखे जाते हैं, लिहाजा लोगों के निकनेम भी चलन में आ जाते हैं। ब्राजील में अमूमन हर इंसान के एक-दो निकनेम जरूर होते हैं, जिससे उनके घरवाले उन्हें बुलाते हैं।

बेटे को फुटबॉलर बनाने का सपना

एडसन यानी पेले का भी निकनेम रखा गया - डिको। पेले के माता-पिता, भाई-बहन या जानने वाले दोस्त उन्हें डिको के नाम से बुलाते रहे। डिको के पिता खुद भी फुटबॉल खेलते थे, लेकिन महज 25 साल की उम्र में चोटिल होने की वजह से उनका फुटबॉल करियर क्लब स्तर से आगे नहीं बढ़ पाया था, लिहाजा उन्होंने अपने बेटे को फुटबॉलर बनाने का सपना देखा।

उनका परिवार अब साउ पाउलो के बाउरू शहर में रहने आ गया था।  बचपन से मिली ट्रेनिंग के चलते पेले की खासियत की चर्चा गली मोहल्लों में होने लगी थी, लेकिन संसाधनों का अभाव था। पेले कभी फटे पुराने कपड़ों से गेंद बनाकर फुटबॉल खेलते थे और कभी पड़ोस के स्टेशन से गुड्स ट्रेन का सामान गायब करके उसे बेचकर गेंद के लिए पैसा जमा करते थे। 9-10 साल की उम्र में डिको अपने साथियों को तेजी से छकाने लगे थे और उन्हें कोई पकड़ नहीं पाता था, लिहाजा उनका नया नाम पड़ गया, गैसोलिना।

इस नाम की वजह ये थी वे गैस की तरह से तेज भागते थे। पेले के मुताबिक ये नाम उन्हें कुछ हद तक पसंद भी आया। मगर उनका नाम पेले कैसे पड़ा। इसको लेकर कई तरह के दावे किए जाते हैं। जो दावा जोरशोर से किया जाता है, वो ये है कि गेलिक भाषा में पेले का मतलब फुटबॉल होता है, लिहाजा उनका नाम पेले पड़ गया।

लेकिन इस दावे को सच नहीं माना जा सकता, क्योंकि गेलिक आयरलैंड के आसपास की भाषा है और उसका कोई शब्द उस जमाने में हज़ारों मील दूर बाउरू, ब्राजील कैसे पहुंच गया होगा, इसका कोई ठोस आधार नहीं मिलता। पेले शब्द हिब्रू भाषा में भी है, जहां उसका मतलब चमत्कार है, लेकिन नाइजीरिया के किसी शब्द का उस वक्त ब्राज़ील तक पहुंचना भी असंभव था।

आखिर पेले नाम कैसे पड़ा?

ऐसे में सवाल यही है कि पेले का नाम, पेले कैसे पड़ गया। उस दौर में ब्राजील में पुर्तगाली भाषा का चलन था और उसमें पेले शब्द का कोई मतलब नहीं निकलता था। लेकिन बावजूद इसके जब 15 साल की उम्र में ब्राजील के मशहूर क्लब सैटोंस से पेले जुड़े तो उनका नाम पेले पड़ चुका था।

पेले नाम रखने जाने के सच के बारे में पेले ने 'व्हाई सॉकर मैटर्स' में बताया है, कोई ठीक-ठीक नहीं बता पाता है कि पेले नाम कहां से आया, लेकिन मेरे मामा जॉर्ज ने जो बताया है, उस पर विश्वास किया जा सकता है। पेले के मामा जॉर्ज, उनके साथ ही रहते थे और कई साल तक उनकी नौकरी के चलते ही पेले के परिवार का भरन-पोषण होता रहा।

जॉर्ज के मुताबिक़, बाउरू की स्थानीय फुटबॉल क्लब टीम के एक गोलकीपर का नाम था बिले, ये वही क्लब था जिसमें पेले के पिता भी खेलते थे। बिले अपनी शानदार गोलकीपिंग के चलते बेहद लोकप्रिय थे। 'दूसरी ओर बचपन में डिको को कई मुकाबलों में गोलकीपर की भूमिका भी निभानी होती थी, जब वे शानदार बचाव करते थे, तो लोग कहने लगे थे कि ये दूसरा बिले है, या देखो ये खुद को बिले मानने लगा है।'

'देखते-देखते ये बिले कब पेले में बदल गया है, इसका किसी को अंदाजा भी नहीं हुआ। हालांकि ये वो दौर था जब डिको, साथियों से भिड़ जाया करते थे कि किसने मुझे पेले बुलाया, क्यों बुलाया, मेरा नाम तो ठीक से लो।'
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पेले ऐसे बने फुटबॉल के ब्रैंड एम्बैस्डर

बहरहाल, आस पड़ोस के लोग उन्हें पेले के नाम से जानने लगे थे, लेकिन आधिकारिक तौर पर पेले कहने का चलन उनके सैंटोस क्लब से जुड़ने के बाद ही शुरू हुआ। अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि सैंटोस के प्रबंधकों ने पेले को एक ब्रैंड के तौर पर बदलने में अहम भूमिका निभाई।

इसका जिक्र करते हुए पेले ने व्हाई सॉकर मैटर्स में लिखा है, 'पेले एक अलग पहचान बन चुका था, एडसन बाउरू से आने वाला एक गरीब लड़का था, जिसे अपने घर परिवार की याद आती थी, लेकिन दूसरी ओर पेले था जो टीनएज में ही राइजिंग स्टार था, जिससे उम्मीद की जा रही थी कि वो दुनिया का सबसे बड़ा एथलीट बनेगा।'

'एडसन जहां अपने में सिमटा और संकोची लड़का था, वहीं पेले हजारों की भीड़ में कैमरे के सामने सहज ढंग से मुस्कुरा सकता था, एक ही आदमी के दो रूप थे, दो भिन्न वास्तविकताएं। एक को मैं जानता था, दूसरा नया था, बदल रहा था और मुझे डराता भी था।' 16 साल की उम्र में सैंटोस ने जिस पेले ब्रैंड को बनाया, उसकी चमक आज छह दशक बाद भी कायम है और पेले 78 साल की उम्र में दुनिया भर में फुटबॉल के ब्रैंड एम्बैस्डर बने हुए हैं।
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