दो दिन पहले मास्को में पहली बार बूढ़े-बूढ़े भिखारी कहीं-कहीं नजर आए तो ये अब तक कहां थे। मास्को में रहने वाले भारतीय छात्र परमवीर ने बताया कि विश्व कप शुरू होने के बाद से ही इस शहर में बूढ़े, भिखारी, बेघर और बिल्ली-कुत्ते एकदम गायब ही हो गए या गायब कर दिए गए। मास्को में भी और शहरों की तरह भिखारियों और बेघरों की कोई कमी नहीं है।
फुटपाथ, पुल के नीचे या बगीचों में ये लोग डेरा लगाए नजर आते रहे हैं। लगभग हर मेट्रो स्टेशन के बाहर भिखारी तो बैठे ही रहते थे, विश्व कप शुरू होने के ठीक पहले सरकार ने न जाने क्या जादू का डंडा घुमाया कि बूढ़े, भिखारी और बेघर लोग हवा ही हो गए। हम भी यहां चार साल से रह रहे हैं, लेकिन ऐसा कहीं नजर नहीं आया। और तो और, इस शहर के कुत्ते और बिल्लियां भी क्या हुईं, कहां गईं, कुछ पता नहीं, वरना यहां बिल्ली का रास्ता काटना आम बात रही है।
रेल से मास्को से सेंट पीटर्सबर्ग आते हुए रास्ते में कहीं कुछ तंबू जैसे नजर आए थे। किसी से पूछा भी था, लेकिन सही जवाब नहीं मिला। अब पता चल रहा है कि मास्को और सेंट पीटर्सबर्ग के बेघर, बेरोजगार, बूढ़े और भिखारियों को रेलवे ट्रैक से दूर लगभग बियाबान जगह पर लाकर रख दिया गया है। यह पोल उस समय खुली, जब कुछ समाजसेवी संस्थाओं ने पूछना शुरू किया। ये संस्थाएं बूढ़े और बेघर लोगों को एक समय का भोजन हर दिन देती हैं।
जब शहर में बूढ़े, बेघर और भिखारी मिलना ही बंद हो गए, तो इन संस्थाओं की चिंता बढ़ी कि अपना काम जारी रखें, तो कैसे। इनमें कुछ तो डायबिटीज के ऐसे मरीज भी हैं, जिन्हें समय पर इंसुलिन और खाना न मिले, तो जान भी जा सकती है। इस बारे में यहां के मेयर का बयान था कि एक माह अगर ये लोग नहीं खाएंगे, तो मर नहीं जाएंगे। इस बात को लेकर संस्थाओं ने विरोध जताया और सरकार के खिलाफ नारेबाजी भी की।
मास्को में कुत्ते-बिल्लियों की भरमार थी, लेकिन बीस दिन से कहीं नजर नहीं आ रहे हैं, तो पता चला है कि सरकार ने किसी कंपनी को इस बात का ठेका दिया है कि सड़क पर कोई कुत्ता या बिल्ली विश्व कप तक नजर नहीं आना चाहिए। कंपनी ने भरपूर पैसा लिया और मास्को, सेंट पीटर्सबर्ग में कहीं भी ये जानवर नजर नहीं आ रहे हैं। इन्हें कहीं ले जाकर बंद कर दिया गया है या मार डाला है, इस बारे में अलग-अलग बातें हैं।
भारतीय छात्र परमवीर ने बताया कि सिर्फ दस दिन में कुत्ते-बिल्ली गायब हो गए। शहर के लोग राहत तो महसूस कर रहे हैं, लेकिन फिक्रमंद भी हैं कि आखिर इनका क्या हुआ। कहीं इन्हें मार तो नहीं दिया। जब कुछ संगठनों ने आवाज उठाई तो यहां के मेयर का बयान आया कि मनुष्य से बढ़ कर नहीं है जानवरों की जिंदगी। अगर मनुष्यों को बचाना है, तो कुछ कड़े कदम उठाना ही पड़ते हैं।
और एक चीज है, जो रूस के शहरों से गायब हुई है, एक माह के दौरान! सड़कों पर सामान बेचने वाले हर जगह नजर आते रहते थे और इनका सामान सस्ता होता है, तो इसकी वजह से भीड़ भी लगी रहती है, लेकिन मेहमानों को शहर सुंदर नजर आए, इसके लिए सड़क की छोटी-छोटी दुकानों को भी रातोंरात गायब कर दिया गया।
मास्को में तो 'गुमटी' का जैसे नामोनिशान ही गायब हो गया है। देखने वालों को सब जगह खाली और चौड़ी नजर आती है। मेहमानों के लिए तो रूसी सरकार ने 'ढंग से' साफ-सफाई कर दी, लेकिन क्या यही तरीका रह गया है खुद को बेहतर मेजबान साबित करने के लिए? क्या बेघर, बूढ़े और भिखारियों की गिनती भी कुत्ते-बिल्ली में करना जरूरी है, मेहमाननवाजी के लिए?