बनर्जी की जिंदगी में संघर्ष तो शुरू से ही था लेकिन पिता की मौत के बाद उनपर जिम्मेदारियों का बोझ भी आ गया। पर उन्होंने खेल नहीं छोड़ा। वह अक्सर खाली पेट ही ट्रेनिंग करते और खेलते। इसी खेल के दम पर उन्हें 15 साल की उम्र में अपनी पहली नौकरी मिल गई। उन्हें 135 रुपये के वेतन पर भारतीय केबल कंपनी में यह नौकरी मिली। इससे उनके परिवार को काफी मदद मिली। इसके बाद 1953 में वह भारतीय रेलवे में टिकट कलेक्टर बन गए। यहां उन्हें पिछली नौकरी के मुकाबले दो रुपये ज्यादा मिलने लगे।
1955 में किया भारत के लिए पर्दापण:
इस दौरान बनर्जी अपने खेल से नेशनल चयनकर्ताओं को प्रभावित तो कर ही चुके थे। उन्होंने 1954 में आर्यन और एक साल बाद पूर्वी रेलवे जॉइन कर ली। उनकी कप्तानी में रेलवे 1958 में कलकत्ता फुटबॉल लीग चैंपियन बना। इससे पहले बनर्जी ने 1955 में ढाका में हुए टूर्नामेंट में भारत की ओर से पर्दापण कर लिया था। यही से उनका ओलंपिक में ऐतिहासिक गोल दागने का सफर शुरू हुआ।
सम्मान जो मिले
- -में नवाजे गए थे पद्मश्री पुरस्कार से। अर्जुन (1961) अवॉर्ड से भी हो चुके हैं सम्मानित
- अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल संघ ने उन्हें 20वीं शताब्दी में भारत का सबसे महान फुटबॉलर घोषित किया था
- फीफा ने 2004 में शताब्दी ऑर्डर ऑफ मेरिट प्रदान किया था
- ओलंपिक समिति की ओर से फेयर प्ले अवॉर्ड से सम्मानित एशिया के एकमात्र फुटबॉलर