क्या यह गोल है, या नहीं? इस बार फुटबॉल वर्ल्ड कप में इस पर बहस नहीं होगी क्योंकि आयोजक पहली बार टूर्नामेंट में गोल लाइन तकनीक का इस्तेमाल करने जा रहे हैं।
सभी 12 स्टेडियमों में इसके लिए विशेष रूप से 14 कैमरे लगा जाएंगे जिसमें से सात-सात दोनों गोल पोस्ट पर होंगे।
इन कैमराओं में प्रति सेकंड 500 फोटो रिकॉर्ड होंगे जिसके बाद कम्प्यूटर तय करेगा कि यह गोल है कि नहीं।
इसके अलावा गेंद के गोल पोस्ट की लाइन पार करते ही रेफरी के हाथ में लगी घड़ी में कंपन होने लगेगी और अपने आप फ्लैश हो जाएगा ‘गोल’।
तकनीक के निर्माताओं का कहना है कि ब्राजील में इसका अब तक 2400 बार परीक्षण कर लिया गया है जिसमें एक बार भी किसी तरह की चूक सामने नहीं आई। पिछले सोमवार को रियो के माराकाना स्टेडियम में आयोजकों के सामने इसको प्रदर्शित किया गया।
फीफा के अधिकारी पिछले कई सालों से इस तकनीक को इस्तेमाल करने की योजना बना रहे हैं।
2010 में खेले गए वर्ल्ड कप में इसका इस्तेमाल भी किया गया लेकिन टूर्नामेंट के दूसरे राउंड में जर्मनी के खिलाफ इंग्लैंड के फ्रैंक लैम्पार्ड द्वारा किए गए गोल के दौरान साफ देखा गया कि गेंद लाइन को क्रॉस कर चुकी है लेकिन तकनीक ने इसे नकार दिया। इसके बाद ही इस तकनीक को वापस ले लिया गया।