बनर्जी और गोस्वामी की जोड़ी मैदान पर अटूट थी लेकिन इसके बावजूद दोनों एक-दूसरे से काफी अलग थे। शानदार व्यक्तित्व के धनी गोस्वामी मोहन बागान की ओर से रोवर्स कप में खेलते हुए मुंबई में आकर्षण का केंद्र हुआ करते थे। गोस्वामी अपने अंतिम दिनों तक भी सिर्फ मोहन बागान के प्रति समर्पित रहे। वह 16 साल की उम्र में इस क्लब से जुड़े थे और फिर हमेशा इसी का हिस्सा रहे। वह मोहन बागान के लिए क्लब क्रिकेट भी खेले।
कहा जाता है कि गोस्वामी ने 1968 में जब मुंबई में अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल से संन्यास की घोषणा की थी तो दो विशेष प्रशंसकों ने उनसे मिलकर उनसे उनका फैसला बदलने का आग्रह किया था। ये दो प्रशंसक और कोई नहीं बालीवुड सितारे दिलीप कुमार और प्राण थे जो कूपरेज मैदान पर ऐसा कोई मैच देखने से नहीं चूकते थे जिसमें गोस्वामी खेल रहे हों।
गोस्वामी की महानता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 30 बरस की उम्र में फुटबॉल को अलविदा कह दिया और फिर अपने दूसरे जुनून क्रिकेट के प्रति प्यार को पूरा किया। उनकी अगुआई में बंगाल ने 1972 में रणजी ट्राफी फाइनल में जगह बनाई।
गोस्वामी ने 1967 में गैरी सोबर्स की वेस्टइंडीज टीम के खिलाफ अभ्यास मैच में संयुक्त क्षेत्रीय टीम की ओर से मैच में आठ विकेट चटकाए। इस मैच के दौरान गोस्वामी ने पीछे की ओर 25 गज तक दौड़ते हुए कैच लपका जिसके बाद सोबर्स ने उनकी जमकर तारीफ की।
गोस्वामी अपने मित्रों से मजाकिया लहजे में कहते थे, 'सोबर्स को नहीं पता था कि मैं अंतरराष्ट्रीय फुटबॉलर था। पीछे की ओर 25 गज दौड़ना मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं है।' उन्होंने कभी क्लब या राष्ट्रीय स्तर पर कोचिंग नहीं दी इसके बावजूद भारतीय फुटबॉल की सबसे बड़ी नर्सरी टाटा अकादमी (टीएफए) के निदेशक पद के लिए वह दिवंगत रूसी मोदी की पहली पसंद थे। वह कोलकाता के शेरिफ भी रहे और उन्होंने समाचार पत्रों में भारतीय फुटबॉल पर लेख लिखे। उन्हें साउथ क्लब में टेनिस खेलना और स्काच पीना भी पसंद था।