"यह मेरे लिए बहुत बड़ा पदक हैं। मेरे पिता होते तो बेहद खुश होते। मैं अपने इस स्वर्ण पदक को अपने पिता को समर्पित करता हूं।" स्वर्ण पदक ग्रहण करने से पहले यह शब्द योगेश्वर दत्त के थे।
विज्ञापन
साल 2006 में जब योगेश्वर को दोहा एशियाई खेलों में खेलने जाना था उसी दौरान उनके पिता का स्वर्गवास हो गया था। बावजूद इसके उन्होंने अपने पिता की यादों को अपनी शक्ति बनाकर वहां कांस्य पदक जीता था, लेकिन आज उन्होंने अपनी इस सफलता को सोने के मेडल में बदल दिया।
योगेश्वर ने पदक जीतने के बाद कहा कि वह अब सबसे पहले अपनी मां से बात करेंगे। वह उनसे बात करने को उतावले हो रहे हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इन खेलों में भाग लेने से पहले उन पर काफी दबाव था।
विज्ञापन
ओलंपिक के बाद योगी की हैट्रिक स्वर्णिम सफलता
पहलवान योगेश्वर दत्त खुलासा करते हैं कि कोरिया उनके लिए बेहद भाग्यशाली रहा है। 2008 में उन्होंने इसी देश में एशियाई चैंपियनशिप में गोल्ड जीता था और यह गोल्ड उन्होंने इस चैंपियनशिप में देश को 21 साल बाद दिलाया था।
चार साल बाद फिर इसी देश में उन्होंने 2012 की एशियाई चैंपयिनशिप में यहां गोल्ड जीता और आज एशियाई खेलों में स्वर्ण उनके हाथ आया। इस लिए वह इस देश को अपने लिए भाग्यशाली मानते हैं।
योगेश्वर कहते हैं कि सच्चाई यह है कि लंदन ओलंपिक के बाद से यह उनका सिर्फ तीसरा टूर्नामेंट है और तीनों में उन्होंने अपने नाम गोल्ड किया। सबसे पहले इसी साल उन्होंने इटली के आमंत्रण टूर्नामेंट में गोल्ड जीता। इसके बाद ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भी वह जीते।
सेमीफाइनल में ही चोटिल हो गए योगी
हालांकि योगेश्वर दत्त की स्वर्णिम सफलता इतनी आसान भी नहीं थी। योगी में जीत का जज्बा भरने के लिए चीफ कोच विनोद कुमार को काफी मेहनत करनी पड़ी थी। सेमीफाइनल मुकाबले के दौरान वह थोड़े चोटिल हो गए थे।
वह लगातार हांफ रहे थे, कई बार बैठे भी जा रहे थे। चीफ कोच विनोद चिल्ला-चिल्लाकर उन्हें उठने को कह रहे थे, फाइनल में बढ़त भी सिर्फ 1-0 की थी, लेकिन योगेश्वर का यह जज्बा ही था जिन्होंने तजाकिस्तानी युसुपोव के आक्रमणों से न सिर्फ अपने को बचाया बल्कि अपनी पिंडली की चोट के दर्द को सहते हुए गोल्ड मेडल अपनी झोली में डाल लिया।
सच्चाई यह है कि सेमीफाइनल में चीनी पहलवान के यीरलानबीके को पिछड़ने के बाद बेहद कड़े मुकाबले में हराने के बाद योगेश्वर को पिंडली में हल्की चोट लग गई थी। फाइनल में तकरीबन चार घंटे का समय बाकी था। इसी दौरान चीफ कोच विनोद कुमार और कोच अनूप कुमार ने उन्हें प्रेरित करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ा।
‘अनूप ने योगेश्वर से यही कहा तू शेर है और शेर कमजोर नहीं पड़ते। याद करो उन कारगिल के शहीदों को जिन्होंने बेहद विपरीत परिस्थितियों के बावजूद देश के लिए लड़ाई लड़ी और कुर्बान हो गए। तुम भी देश के लिए लड़ाई लड़ने जा रहे हो फर्क सिर्फ इतना है यहां गोलियां नहीं चल रही हैं बस तुम्हें सब कुछ भूलकर लड़ना है।’ बस कोच के यही शब्द काम कर गए और एशियन गेम्स में पूरे 28 साल बाद कुश्ती का गोल्ड देश के नाम हो गया।
चीनी पहलवान को चित कर पलट दी बाजी
बाद में योगेश्वर दत्त ने भी स्वीकार किया कि वह पिंडली की चोट के चलते बेहद थक गए थे। वह लगातार उसकी टांग पकड़ रहे थे लेकिन उसका रक्षण अच्छा था तभी वह सिर्फ एक अंक ले पाए।
योगेश्वर के लिए यहां जीतना आसान नहीं था। पहले ही मुकाबले में उनके सामने मजबूत उत्तर कोरियाई जे कांग पहलवान था, लेकिन उन्होंने 7-4 से जीत हासिल कर अच्छी शुरुआत की। हालांकि उनकी असली परीक्षा सेमीफाइनल में थी। एकबारगी तो लगा कि उनका अभियान भी दूसरे पहलवानों की तरह यहीं समाप्त होने जा रहा है।
तीन मिनट का पहला दौर समाप्त होने पर वह 1-3 से पिछड़े थे। दूसरे दौर में कुश्ती समाप्त होने में कुछ ही सेकंड बाकी रह गए थे और यहीं उन्होंने कभी हार न मानने वाली अपनी इच्छाशक्ति दिखाते हुए बिठा निकले दांव लगाकर चीनी पहलवान को चित कर दिया। पूरा स्टेडियम हतप्रभ होकर तालियां बजा रहा था तो कोच विनोद कुमार योगेश्वर को गोद में उठाकर नाचने लगे।
योगेश्वर ने कहा भी कि वह आखिरी मिनटों में अच्छा खेलते हैं यही वजह है उन्होंने चीनी को अपने दांव में दबोच लिया। विनोद ने बाद में खुलासा किया कि दरअसल यह चीनी नहीं बल्कि कजाखस्तान का पहलवान था जो हाल ही में चीन जाकर बस गया है। यही कारण था कि उसने योगेश्वर को बेहद गंभीर चुनौती दी।
इससे पहले एशियन गेम्स का कुश्ती में आखिरी गोल्ड इसी देश में 1986 के सियोल एशियाड में करतार सिंह ने जीता था।
हालांकि योगेश्वर दत्त के स्वर्णिम सफलता को अन्य पहलवान जारी नहीं रख सके। योगेश्वर के मुकाबले के बाद भारतीय पहलवान बबिता 55 किलो में और सत्यवृत कादियां 97 किलो में कांस्य पदक की होड़ में थे। लेकिन दोनों को ही हार का सामना करना पड़ा।
बबिता को चीनी पहलवान ने 10-2 से हार का सामना करना पड़ा। जबकि सत्यवृत को कजाखिस्तानी पहलवान के हाथों 3-0 से हारकर कांस्य पदक गंवाना पड़ा।