भारत के पैरा एथलीट प्रणव सूरमा ने एशियन पैरा गेम्स 2026 में पुरुषों की डिस्कस थ्रो F51/52/53 स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीत लिया। मंगलवार को नागोया में आयोजित मुकाबले में सूरमा ने 11.66 मीटर का थ्रो कर गेम्स और एशियन रिकॉर्ड बनाया। इसके साथ ही भारत ने प्रतियोगिता में अपना छठा स्वर्ण पदक हासिल किया। 31 वर्षीय सूरमा ने शानदार वापसी करते हुए यह उपलब्धि हासिल की। वर्ष 2011 में रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लगने के कारण उन्हें क्वाड्रिप्लेजिया हो गया था। इसके बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प के दम पर पैरा एथलेटिक्स में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है।
पहले प्रयास में बनाई बढ़त, तीसरे में रिकॉर्ड
मुकाबले में सूरमा से पहले उतरे भारत के राम रतन सिंह 10.35 मीटर के थ्रो के साथ बढ़त बनाए हुए थे। हालांकि, सूरमा ने अपने पहले ही प्रयास में 10.79 मीटर का थ्रो कर शीर्ष स्थान हासिल कर लिया। इसके बाद उन्होंने तीसरे प्रयास में 11.66 मीटर की दूरी हासिल की। यह उनका प्रतियोगिता का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा। इस थ्रो के साथ उन्होंने गेम्स और एशियन रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिया। कोई भी प्रतिद्वंद्वी उनके इस प्रदर्शन को पीछे नहीं छोड़ सका। भारत के राम रतन सिंह ने रजत पदक जीता, जबकि ईरान के हेमामी अलीरेजा को कांस्य पदक मिला।
20.20 मीटर का थ्रो करने वाले खिलाड़ी को मिला कांस्य
इस स्पर्धा में ईरान के हेमामी अलीरेजा ने 20.20 मीटर का थ्रो किया, जो सूरमा के 11.66 मीटर के थ्रो से काफी अधिक था। इसके बावजूद उन्हें कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। दरअसल, पुरुषों की डिस्कस थ्रो F51/52/53 स्पर्धा में तीन अलग-अलग खेल वर्गों के खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। ऐसे मुकाबलों में केवल थ्रो की दूरी के आधार पर परिणाम तय नहीं होता, बल्कि रजा पॉइंट सिस्टम के जरिए खिलाड़ियों के प्रदर्शन का आकलन किया जाता है। इस प्रणाली में खिलाड़ियों के खेल वर्ग और प्रदर्शन के आधार पर अंक निर्धारित किए जाते हैं, जिससे अलग-अलग तरह की शारीरिक दिव्यांगता वाले खिलाड़ियों के प्रदर्शन की निष्पक्ष तुलना की जा सके। सूरमा और राम रतन सिंह F51 वर्ग में प्रतिस्पर्धा करते हैं, जबकि अलीरेजा F53 वर्ग के खिलाड़ी हैं। इसी कारण अलीरेजा का 20.20 मीटर का थ्रो उन्हें स्वर्ण पदक नहीं दिला सका।
16 साल की उम्र में हादसे ने बदल दी जिंदगी
4 अक्तूबर 1994 को हरियाणा के फरीदाबाद में जन्मे प्रणव सूरमा की जिंदगी वर्ष 2011 में हुए एक हादसे के बाद बदल गई थी। उस समय वह महज 16 साल के थे। हादसे में उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई, जिसके कारण उन्हें क्वाड्रिप्लेजिया हो गया। इस चुनौती के बावजूद सूरमा ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने दिल्ली के सेंट पॉल स्कूल से स्कूली शिक्षा पूरी की और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पोस्टग्रेजुएट डिग्री हासिल की। खेल के साथ-साथ वह बैंक ऑफ बड़ौदा में स्केल-2 मैनेजर के रूप में भी कार्यरत हैं। उनके इस सफर में परिवार की अहम भूमिका रही है। उनके पिता संजीव सूरमा ने बेटे की देखभाल और खेल में सहयोग देने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी थी। वह उनके साथ रहकर यात्रा और प्रतियोगिताओं से जुड़ी जरूरतों में मदद करते रहे। कोच नरसी राम के मार्गदर्शन में प्रणव ने पैरा एथलेटिक्स में अपना करियर आगे बढ़ाया।
पेरिस पैरालंपिक में जीता था रजत पदक
प्रणव सूरमा ने वर्ष 2024 के पेरिस पैरालंपिक में पुरुषों की क्लब थ्रो F51 स्पर्धा में रजत पदक जीता था। इस स्पर्धा में भारत के धरमबीर ने स्वर्ण पदक हासिल किया था, जिससे भारतीय खिलाड़ियों ने पहला और दूसरा स्थान अपने नाम किया। इससे पहले सूरमा ने हांगझोउ एशियन पैरा गेम्स में क्लब थ्रो F51 स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीता था। उन्होंने 30.01 मीटर का थ्रो कर गेम्स रिकॉर्ड बनाया था। इसके अलावा वह सर्बिया ओपन में भी जीत हासिल कर चुके हैं और बीजिंग तथा ट्यूनीशिया में आयोजित पैरा एथलेटिक्स ग्रां प्री प्रतियोगिताओं में पदक जीत चुके हैं।
खेलों में उनके योगदान के लिए उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। भारतीय खेल प्राधिकरण (साइ) और ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट ने भी उनके खेल करियर को आगे बढ़ाने में सहयोग दिया है। एशियन पैरा गेम्स 2026 में डिस्कस थ्रो का स्वर्ण पदक जीतकर प्रणव सूरमा ने अपने करियर में एक और बड़ी उपलब्धि जोड़ ली है। गंभीर चोट के बाद अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर अपनी पहचान बनाने वाले सूरमा की यह सफलता उनके संघर्ष, मेहनत और दृढ़ संकल्प को दर्शाती है।