आशीष कुमार का नाम आपको याद होगा। दिमाग पर जोर डालने की जरूरत नहीं है। दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में एक रजत और कांस्य जीतने के बाद गुआंगझू एशियाई खेलों में कांस्य पदक हासिल कर इलाहाबाद का यह जिम्नास्ट देश ही नहीं दुनिया की नजरों में भी छा गया था। लेकिन जिम्नास्टिक फेडरेशन ऑफ इंडिया की आपसी लड़ाई के चलते जिस तेजी से यह जिम्नास्ट उभरा उसी तेजी से गुमनामी के धुंधलके में खो भी गया।
आप यह सुनकर जरूर हैरान रह जाएंगे कि इस प्रतिभाशाली जिम्नास्ट ने अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट तो छोड़िए पिछले दो सालों से नेशनल चैंपियनशिप तक नहीं खेली है। आशीष ने आखिरी टूर्नामेंट 2011 में बांग्लादेश में खेला था जहां उन्होंने चार गोल्ड जीते थे।
दो फेडरेशनों के बीच चल रही अस्तित्व की लड़ाई के चलते पिछले दो सालों से जिम्नास्टिक का कोई कैंप भी नहीं लगा है। खेल मंत्रालय की सहमति पर जसपाल कांधारी गुट ने नेशनल चैंपियनशिप जरूर कराई लेकिन रेलवे स्पोर्ट्स प्रमोशन बोर्ड ने इसमें अपनी टीम ही नहीं भेजी। जिसके चलते रेलवे में नौकरी करने वाले आशीष यहां भी नहीं खेले। वह पिछले दो सालों से इलाहाबाद स्थित यूके मिश्रा अकादमी में अपने दम पर अभ्यास कर रहे हैं।
उनके साथ दुर्भाग्य लंदन ओलंपिक के पहले शुरू हो गया था। आशीष की बदौलत इस खेल को खेल मंत्रालय ने अपने कोर ग्रुप में शामिल किया लेकिन फेडरेशन की लड़ाई और रूसी कोच व्लादीमीर चेटकोव की मनमानी के चलते भारतीय टीम न ओलंपिक क्वालीफाइंग टेस्ट इवेंट के लिए बुलाई गई न ही उन्हें वाइल्ड कार्ड मिला। आशीष का कहना है कि उन्होंने रियो ओलंपिक में खेलने का अपना सपना जिंदा रखा है। हालांकि उन्हें खुद नहीं मालूम है कि उनका यह सपना पूरा होगा भी या नहीं।
आखिरी टूर्नामेंट
2011 में बांग्लादेश में खेला, 4 स्वर्ण पदक जीते
उपलब्धियां
कॉमनवेल्थ गेम्स-वॉल्ट में रजत
फ्लोर एक्सरसाइज में कांस्य
एशियाई खेल-फ्लोर एक्सरसाइज में कांस्य
यह प्रदर्शन करने वाले देश के एकमात्र जिम्नास्ट
'अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों की क्लिपिंग अपने लैपटॉप पर देखता रहता हूं। यही लगता है कि अगर यहां होता तो पदक जीत सकता था।'
- आशीष कुमार