कॉमनवेल्थ गेम्स के बाद खेल मंत्रालय ने लंदन ओलंपिक की तैयारियों के लिए 259 करोड़ रुपये की भारी भरकम राशि खर्च करने की घोषणा कर लगभग हर समारोह में वाह-वाही लूटी। लेकिन सच्चाई यह है कि घोषित राशि का लगभग आधा हिस्सा डेढ़ सौ करोड़ ही खर्च हो पाया है। बाकी की राशि खेल मंत्रालय को वित्त मंत्रालय से मांगने की जरूरत ही नहीं पड़ी।
सही मायनों में यह राशि देश में खेलों और खिलाड़ियों का भला करने के लिए काफी साबित होनी थी। लेकिन न तो खेल मंत्रालय इस दिशा में कोई ठोस प्लानिंग बना सका और न ही खेल संघ इसका फायदा उठा सके। ओलंपिक से पहले गुआंग झू एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता एथलीट जोसेफ अब्राहम विदेशी दौरे पर नहीं जा सके। जिसके चलते वह ओलंपिक के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाए। इसी तरह शूटर जयदीप कर्माकर को भी काफी देर से एनएसडीएफ से राशि जारी की गई।
खेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का तर्क है कि खेल संघों की प्लानिंग के हिसाब से ओलंपिक की तैयारियों पर राशि खर्च होनी थी। संघों ने जिस हिसाब से राशि मांगी उन्हें जारी कर दी गई। सर्वाधिक राशि टीमों के 146 विदेशी दौरों पर साढ़े 70 करोड़ रुपये खर्च हुए। जबकि तैयारियों के लिए लगाए गए 103 कैंपों पर 65 करोड़ खर्च हुए। रोइंग, तीरंदाजी, वेटलिफ्टिंग को कोई विदेशी कोच ही नहीं मिला। यहां तक वेटलिफ्टर डॉक्टर की डिमांड करते थक गए लेकिन व्यवस्था नहीं की गई।
ओलंपिक की तैयारियों के लिए 945 कैंपरों पर 21 विदेशी व 129 भारतीय कोच लगाए गए जबकि 65 सपोर्ट स्टाफ को लगाया गया। एनएसडीएफ के जरिए 27 खिलाड़ियों पर 10 करोड़ रुपये खर्च किए जा सके। सर्वाधिक खर्च शूटिंग पर लगभग 23 करोड़ रुपये हुआ। इसके बाद ओलंपिक में अंतिम स्थान पर रही हॉकी पर 19 करोड़ रुपये खर्च हुए।
ठीक यही हाल कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान हुआ था। मंत्रालय की ओर से 678 करोड़ रुपये की राशि खिलाड़ियों की तैयारियों के लिए घोषित की गई थी। लेकिन खर्च आधे भी नहीं हुए थे। मंत्रालय को साढ़े तीन सौ करोड़ रुपये की अधिक राशि वित्त मंत्रालय को वापस करनी पड़ी थी।