पद्मश्री से सम्मानित मुरलीकांत पेटकर रविवार को देहरादून में होने वाले अमर उजाला कार्यक्रम में शिरकत करेंगे। उन्होंने जर्मनी के हीडलबर्ग में 1972 के ग्रीष्मकालीन पैरालिंपिक में स्वर्ण पदक जीता था। इसके अलावा 50 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी स्पर्धा में 37.33 सेकंड का समय लेकर विश्व रिकॉर्ड बनाया था।
आइये जानते हैं उनकी कहानी..
कहां हुआ जन्म?
मुरली पेटकर का जन्म महाराष्ट्र के सांगली जिले के पेठ इस्लामपुर गांव में एक नवंबर, 1944 को हुआ था। उन्हें बचपन से ही खेल-कूद का शौक था। पढ़ाई के समय वह अक्सर खेलने के लिए मैदान पहुंच जाते थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब मुरलीकांत 12 साल के हुए तब उनके जीवन में बहुत बड़ा बदलाव हुआ था। दरअसल, 12 साल की उम्र में मुरलीकांत और गांव के बेटे के बीच कुश्ती का मुकाबला हुआ जिसमें पेटकर को जीत मिली। आमतौर पर मुकाबला जीतने के बाद विजेताओं को बधाई मिलती है लेकिन मुरलीकांत के साथ उल्टा हुआ। उन्हें और उनके परिवार को जान से मारने की धमकी मिली।
आर्मी में हुए भर्ती
मुकाबले में जीतने पर उन्हें 12 रुपये इनाम में मिले थे। इनाम की राशि लेकर मुरलीकांत घर छोड़कर भाग गए। इसके बाद उन्होंने काफी संघर्ष किया और आर्मी में भर्ती हुए। वहां उन्हें उनके हुनर की पहचान हुई। मुरलीकांत ने आर्मी में रहते हुए बॉक्सिंग सीखी। साल 1964 में उन्हें टोक्यों में हुई अंतरराष्ट्रीय सर्विसेज स्पोर्ट्स मीट में भाग लेने का मौका मिला। यहां उन्होंने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए बॉक्सिंग में मेडल जीता। इनाम के तौर पर मुरलीकांत को कुछ दिनों के लिए जम्मू और कश्मीर में भेजा गया।
साल 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्हें नौ गोलियां लगीं। उन्हें जांघ, गाल और खोपड़ी में गोलियां लगीं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक गोली आज भी उनकी रीढ़ में धंसी हुई है। इस हमले से पूरे कैंप में भगदड़ मच गई जिससे आर्मी जीप उन्हें रौंदती हुई निकल गई। एक इंटरव्यू में पेटकर ने इस घटना को याद करते हुए कहा था, "मुझे इतना याद आता है कि हम लंच के बाद आराम कर रहे थे।तभी अचानक से मेजर हवलदार दौड़ते हुए आए। हम में से कई लोग आधी नींद में थे।हमें लगा कि चाय के लिए बुलाया जा रहा है।"
2018 में पद्मश्री से किए गए सम्मानित
इस घटना के बाद मुरलीकांत को आईएनएचएस अश्विनी में भर्ती कराया गया। हमले की वजह से उनकी कमर के निचले हिस्से ने काम करना बंद कर दिया था। कहा जाता है कि उनकी याददाश्त भी चली गई थी। माना जाने लगा था कि वह सामान्य जीवन नहीं जी पाएंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक दिन बेड से नीचे गिरने के बाद उनकी याददाश्त वापस आई थी। साल 1969 में आर्मी से रिटायर हुए।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पूर्व भारतीय क्रिकेटर विजय मर्चेंट एक एनजीओ चलाते थे। उन्होंने मुरलीकांत को पैरालंपिक खेलों तक पहुंचाया। साल 1972 में जर्मनी में हुए समर पैरालंपिक खेलों में उन्होंने भाग लिया और स्विमिंग में विश्व रिकॉर्ड कायम किया। उन्होंने 37.33 सेकेंड में स्विमिंग पूरी करके देश का नाम रोशन किया था। इससे पहले उन्होंने स्कॉटलैंड में कॉमनवेल्थ पैरालंपिक खेलों में भाग लिया था। इस दौरान उन्होंने 50 मीटर फ्रीस्टाइल स्विमिंग में स्वर्ण जीता था। इसके अलावा जैवलिन थ्रो में रजत और शॉटपुट में कांस्य पदक जीता। 2018 में मुरलीकांत को पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।