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Amar Ujala Samvad 2023: कैसे हरियाणा के छोटे से गांव से निकली रानी ने दुनिया में हॉकी में बजाया डंका? जानें

Mon, 19 Jun 2023 06:51 PM IST
स्वप्निल शशांक स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, देहरादून

सार

रानी रामपाल ने रातों रात इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं की है। इसके लिए उन्होंने वर्षों मेहनत कर पसीना बहाया। उनका परिवार बहुत गरीब था। दो समय की रोटी के लिए उनके परिवार को काफी संघर्ष करना पड़ता था।
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रानी रामपाल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अमर उजाला 'संवाद' कार्यक्रम में भारतीय महिला हॉकी टीम की पूर्व कप्तान रानी रामपाल ने टोक्यो ओलंपिक से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। रानी हरियाणा के एक छोटे से गांव शाहबाद मारकंडा से आती हैं। एक छोटे से गांव से निकलकर एक चैंपियन एथलीट बनने तक का सफर उन्होंने खुद 'संवाद' कार्यक्रम में बताया। आइए जानते हैं...
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'शाहबाद मारकंडा से कई लड़कियों ने किया भारत का प्रतिनिधित्व'

रानी ने बताया- मेरे कोच सरदार बलदेव सिंह का महिला हॉकी के लिए बड़ा योगदान रहा है। आप उनके बारे में पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि एक छोटे से कस्बे शाहबाद मारकंडा से 70 लड़कियां हॉकी का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। एक पंजाबी स्कूल से इसकी शुरुआत हुई थी। लड़कियों के लिए वहां सिर ढंकने का ड्रेस कोड था। वे लुधियाना से थे, लेकिन हरियाणा में काम करना चाहते थे। जब उन्होंने स्कूल मैनेजमेंट से कहा कि हम यहां कुछ शुरू करते हैं तो सबसे बड़ी चुनौती का उन्होंने वहीं सामना किया। वे ड्रेस कोड से हटने को राजी नहीं थे। उन्होंने कुछ लोग ढूंढे, जिन्होंने स्कूल के लोगों को कन्विंस किया। पहले सूट में हॉकी हुई, फिर लोअर-टी-शर्ट में हुई। जब लड़कियां नेशनल्स में जाने लगीं तो स्थिति बदली। अब वहां से आठ से नौ लड़कियां भारत की कप्तानी कर चुकी हैं। 150 लड़कियां अलग-अलग सरकारी विभागों में नौकरी कर रही हैं। इनमें से कुछ लड़कियां ऐसे परिवारों से थीं, जहां तीन वक्त का खाना मिलना मुश्किल था। 

'खेल के लिए जुनून चाहिए'

रानी ने बताया- पहले सुविधाएं नहीं थीं, अब हैं। हमें सरकार समर्थन कर सकती है, पैसा दे सकती है, उपकरण दे सकती है, लेकिन अगर आपमें व्यक्तिगत जुनून नहीं है तो फंडिंग काम नहीं आएगी। अकेला जुनून है और संसाधन नहीं हैं तो भी काम नहीं हो सकता। 

रानी टोक्यो ओलंपिक में भारत की कप्तान थीं

एक समय था जब लोग महिला हॉकी के बारे में बात करते थे तो उनकी जुबां पर शाहरुख खान की फिल्म चक दे इंडिया का नाम आ जाता था। शाहरुख ने पर्दे पर एक कमजोर टीम को चैंपियन बनाया था। टोक्यो ओलंपिक से पहले भारतीय महिला हॉकी टीम भी गुमनामी में थी। फिर टोक्यो में जो हुआ वह सबके दिल में बस गया। भारतीय टीम क्वार्टर फाइनल में मजबूत ऑस्ट्रेलिया को हराकर सेमीफाइनल में पहुंची। हालांकि, टीम ने भले ही सेमीफाइनल में पहुंचने के बाद भी पदक नहीं जीता, लेकिन भारत में महिला हॉकी का एक नया युग शुरू हुआ। इस टीम को यहां तक पहुंचाने में जिस खिलाड़ी का बड़ा योगदान है वह टोक्यो ओलंपिक में टीम की कप्तानी करने वाली रानी रामपाल हैं।

रानी ने काफी संघर्षों का सामना किया

रानी रामपाल ने रातों रात इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं की है। इसके लिए उन्होंने वर्षों मेहनत कर पसीना बहाया। उनका परिवार बहुत गरीब था। दो समय की रोटी के लिए उनके परिवार को काफी संघर्ष करना पड़ता था। उनके पिता घोड़ा गाड़ी चलाने का काम करते थे। बड़ी मुश्किल से घरवालों ने रानी को स्कूल में एडमिशन करवाया। रानी जब छह से सात साल की हुईं, तो उन्हें मैदान में दूसरे बच्चों को देखने के बाद हॉकी खेलने का शौक हुआ। उन्होंने अपने पिता से हॉकी खेलने की इच्छा व्यक्त की, जिसपर उनके पिता राजी नहीं हुए। उस दौरान लड़कियों का हॉकी खेलना काफी बड़ी बात थी। बहुत जिद करने के बाद उनका शाहबाद हॉकी एकेडमी में दाखिला करवाया गया। उसके बाद रानी ने कभी मुड़कर नहीं देखा। आज वह भारत की दिग्गज हॉकी खिलाड़ियों में शामिल होती हैं। 

रानी रामपाल के नाम पर हॉकी स्टेडियम भी

रायबरेली के हॉकी स्टेडियम को भारतीय टीम की स्टार हॉकी खिलाड़ी रानी रामपाल के नाम पर रखा गया है। वह यह उपलब्धि पाने वालीं भारत की पहली महिला खिलाड़ी बनीं। एमसीएफ रायबरेली ने हॉकी स्टेडियम का नाम बदलकर 'रानीज गर्ल्स हॉकी टर्फ' (Rani's Girls Hockey Turf) कर दिया है। 
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रानी रामपाल की उपलब्धियां:
  • 2013 में जूनियर विश्व कप में कांस्य जीतने वाली टीम की सदस्य थीं
  • एशिया कप में उनके रहते भारतीय महिला टीम तीन बार पदक जीती। 2009 में रजत पदक, 2013 में कांस्य पदक और 2017 में स्वर्ण पदक।
  • एशियाई खेलों में वह दो बार पदक जीतने वाली टीम में रहीं। 2014 में कांस्य पदक और 2018 में रजत पदक। 2018 जकार्ता एशियाई खेलों में रानी रामपाल टीम की कप्तान थीं।
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