दुनिया में आज तक उनसे बड़ा दूसरा फ्रीस्टाइल पहलवान पैदा नहीं हुआ है। फीला ने तो उन्हें 20वीं शताब्दी का सबसे महान पहलवान का खिताब दे रखा है। आखिर उनके नाम 1964, 68 और 72 के ओलंपिक के स्वर्ण और सात वर्ल्ड खिताब जो हैं। इन्हीं महान अलेक्जांद्र मेदवेद का आर्शीवाद भारतीय पहलवानों को मिला है।
मिंस्क (बेलारूस) में मेदवेद ने न सिर्फ भारतीय टीम की ओलंपिक की तैयारियों को देखा बल्कि उन्होंने लंदन ओलंपिक के लिए पूरी टीम को पदक जीतने की शुभकामनाएं दी हैं। बीजिंग ओलंपिक के पदक विजेता सुशील कुमार इस मुलाकात से फूले नहीं समां रहे हैं। वह मेदवेद के मुंह से उनकी तारीफ और शुभकामनाओं को अपने लिए प्रेरणा मान रहे हैं।
मेदवेद ने यह सारी सफलताएं रूस के लिए अर्जित कीं। लेकिन अब वह बेलारूस के नागरिक हैं। जहां उन्हें राष्ट्रीय हस्ती का दर्जा प्राप्त है। भारतीय टीम के जार्जियाई कोच व्लादीमीर मेट्रेशविली का उनसे अच्छा परिचय है। व्लादीमीर ही मिंस्क में एक दिन भारतीय पहलवानों की तैयारियों को दिखाने के लिए मेदवेद को लेकर आए।
उन्होंने सुशील, योगेश्वर समेत बाकी सभी पहलवानों से उनकी मुलाकात कराई और उनके बारे में बताया। सुशील को वह पहले से जानते हैं। हालांकि रूसी भाषा का ज्ञान होने के कारण वह पहलवानों से लंबी बात नहीं कर सके। लेकिन उन्होंने व्लादीमीर से न सिर्फ सभी की तैयारियों के बारे में पूछा बल्कि उन्हें ओलंपिक के लिए कुछ गुर भी बताए। बाद में तैयारियों के दौरान इन्हें अमल में भी लाया गया।
सुशील कुमार इस मुलाकात को ऐतिहासिक मान रहे हैं। उनका कहना है कि इतने बड़े पहलवान से मुलाकात करना और उनकी शुभकामनाएं मिलना किसी प्रेरणा से कम नहीं है। यह पूरी टीम के लिए एक बड़ा लम्हा था। जो उनके लिए काफी काम आएगा। बेलारूस में पहलवानों ने वहां की राष्ट्रीय टीम, अमेरिका की ए और बी टीम और पेरू के पहलवानों के साथ तैयारियों को अंजाम दिया।