सवाल है कि सत्कर्म में लगे गुनी ज्ञानी लोगों को कष्ट कठिनाइयां क्यों होती है और दुष्कर्मों में लगे, बेईमान और धोखेबाजों को हर तरह की सुविधा क्यों मिल जाती है।
अपने आसपास के परिवार से इस तरह के उदाहरण चुनकर कर्मफल के सिद्धांत की धज्जियां उड़ाते लोगों को दैवी संपद महामंडल की चेन्नई शाखा के अध्यक्ष जी. नागराव ने एक अध्ययन में उनकी आपत्तियों का उत्तर दिया है।
यह भी साबित किया है कि सच्चाई और मेहनत के रास्ते पर चलकर आज भी कामयाब हुआ जा सकता है। इन आदर्शों के प्रति निष्ठा के साथ व्यक्ति को साहसी और परिस्थियों में सामंजस्य बैठाने की कला भी आनी चाहिए।
अपने अध्ययन में चालीस लोगों के कामयाब लोगों के तौर तरीकों का हवाला देकर उन्होंने बताया कि उन सबमें साहस, पहल करने की वृत्ति और सामंजस्य साधने का गुण था।
गौर करने लायक बात यह थी कि इन लोगों नें अनीति और शार्टकट अपनाने वाले लोगों की कामयाबी जल्दी ही हाथ से फिसल गई जबकि नीति और ईमानदारी अपनाने वालों की साख दिनोंदिन बढ़ती गई और उनकी सफलता का ग्राफ निरंतर ऊंचा उठता गया।
नागराव की तरह महामंडल के संन्यासी स्वामी दिव्यानंद का भी मानना है कि पिछले कर्मों के कारण भी कभी कदा सफलता में देरी हो सकती है पर अच्छे प्रयासों का फल जरूर मिलता है।
कर्मफल के नियम को समझाते हुए उन्होंने एक वेदमंत्र का हवाला दिया और कहा कि जो कर्म किए जा चुके हैं वे छोड़ दिए गए तीरों की तरह है। तीर अपने लक्ष्य या परिणाम तक पहुंचेंगे ही।
लेकिन तरकश में अभी बहुत से तीर बाकी है, जिन्हें समझ बूझ कर छोड़ा जाना चाहिए। वे जिस तरह साधे जाएंगे, वैसा ही परिणाम देंगे। शास्त्रीय भाषा में उन्होंने इस निष्कर्ष को प्रारब्ध, संचित और क्रियमाण कर्मों से परिभाषित किया। उनके अनुसार बीत चुके समय या पिछले जन्मों के कर्म संचित कर्म हैं।
इनका प्रभाव व्यक्ति के चरित्र, रुझान, क्षमता, प्रवृति और इच्छा में झलकता है। प्रारब्ध भी इन्हीं संचित कर्मों का हिस्सा है और यह व्यक्ति के वर्तमान जीवन को प्रभावित करते हैं।
इन दिनों स्थितियों पर नियंत्रण नहीं है क्योंकि इनका फल मिलना शुरु हो गया है। पर क्रियमाण अभी बाकी है। क्रियमाण अर्थात जो कर्म किए जा रहे हैं या किए जाने हैं। कठिन तो है पर क्रियमाण कर्मों से एक सीमा तक प्रारब्ध को भी नियंत्रित किया जा सकता है।